कई दिनों से यूक्रेन से भारतीय छात्रों को वापस लाने की कवायद चल रही है, पर अभी भी सारे छात्र वापस नहीं लाए जा सके हैं। समझ में नहीं आता कि चार-चार मन्त्री वहाँ जाकर क्या कर रहे हैं? वीके सिंह के अलावा बाक़ी लोग क्या सचमुच परिस्थितियों पर क़ाबू पाने लायक़ हैं? ज्योतिरादित्य सिन्धिया जैसे लोगों का क्या काम है? ऐसे दस-बीस लोग इकट्ठे हो जाएँ तो बना-बनाया काम भी गुड़-गोबर कर दें। मुझे तो लगता है कि ‘ऑपरेशन गङ्गा’ अपने लोगों को बचाने का भारत का अब तक का सबसे लचर अभियान है। एक तरफ़ छात्र परेशान हैं, भूख छोड़िए, दो बूँद पानी के लिए बेहाल हैं और दूसरी तरफ़ भारतीय दूतावास का हाल यह है कि वह छात्रों की कोई मदद तक नहीं कर पा रहा। यह सब देखकर बस यही कहा जा सकता है कि हमारा देश अभी हाल बस पाकिस्तान जैसे थके-हारे देश से ही लड़ने की ताक़त जुटा पाया है।
भारत की तुलना यूक्रेन से कीजिए, जिसके बारे में सोशल मीडिया पर कुछ लोग ज्ञान दे रहे हैं कि वह ग़रीब मुल्क है। आपने मिसाइलों के हमले में क्षतिग्रस्त यूक्रेनी इमारतें देखी होंगी। ध्यान से देखिए तो पता चलेगा कि जिस इमारत पर मिसाइल गिरी है, उसका सिर्फ़ निशाने पर आया हिस्सा ही ज़मीन्दोज़ हुआ है, बाक़ी की पूरी इमारत सही-सलामत है। सोचिए कि यूक्रेनी इमारतों में मज़बूती कितनी है। कीव, खारकीव जैसे शहरों की तसवीरें भी देखिए। साफ़-सुथरे और खुले-खुले शहर। भारत के शहरों को इनके पासङ्ग भी क्या रख सकते हैं? हमारे शहरों का हाल यह है कि एक इमारत पर मिसाइल गिर जाए तो अगल-बगल की दो-चार इमारतें बस धमक से धराशायी हो जाएँ। शाहबेरी वग़ैरह की घटनाओं की याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि यहाँ बिना किसी हमले के बनने के दौरान भी इमारतें धराशायी हो सकती हैं। भ्रष्टाचार की ऐसी कहानियाँ शायद ही किसी और देश में लिखी जाती हों।
जिस देश में नेता-मन्त्री बनने के लिए अभी भी आवारागर्दी, लफङ्गई, गुण्डई ही सबसे बड़ी योग्यता हो, उस देश को स्वावलम्बी और शक्तिशाली बनने में वक़्त लगेगा। फूटी ढोल और छेदीले परदे के हारमोनियम पर सत्ता के रामराज्य और विपक्ष के समाजवाद का राग अलापने से ज़्यादा कुछ नहीं होने वाला।
मैं देश का हौसला तोड़ने की बात नहीं कर रहा, बल्कि यह यथार्थ-दर्शन है और इस बात का सङ्केत है कि हमें सचमुच कुछ करने की ज़रूरत है, अन्यथा ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ के नए शिगूफ़े और शातिरपने का शिकार होने से हम बच नहीं पाएँगे। यह ठीक है कि बीते कुछ सालों में हमने कुछ तो बेहतर किया है, पर यह भी सच है कि हम कई मौक़ों पर पश्चिमी हथकण्डों के शिकार होकर क़ायदे से मूर्ख बने हैं।

—सन्त समीर—