आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

युक्रेन मे भीषण युद्ध के बीच ‘त्राहि माम्’ करते भारतीय विद्यार्थी!

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

युक्रेन पर रूसी सेना के आक्रमण के दसवें दिन यानी ५ मार्च को वहाँ भीषण तबाही का मंज़र दिखता रहा। वहाँ चिकित्साविज्ञान का अध्ययन करने के लिए गये लगभग ३० हज़ार भारतीय विद्यार्थी गये थे, जिनमे से दसवें दिन तक लगभग १० हज़ार विद्यार्थी स्वदेश सुरक्षित लाये जा चुके हैं। जो अभी तक युद्ध की भयावह स्थिति को देख रहे हैं, उनकी मनोदशा की कहानी अत्यन्त कारुणिक है। हम १ मार्च को कर्नाटक के निवासी और खार्किव नेशनल मेडिकल युनिवर्सिटी मे चौथे वर्ष के विद्यार्थीं नवीन शेखरप्पा की खार्किव/खारकीव नगर मे ‘सुपर मार्किट’ के पास की गयी गोलाबारी मे हुई हत्या की अप्रिय घटना को देख चुके हैं, साथ ही नवीन के साथ रहे साथी पंजाब के चन्दन के गम्भीर रूप मे घायल होने के बाद हुई मृत्यु तथा एक अन्य भारतीय विद्यार्थी हरजोत सिंह की गोली लगने से उसके घायल होने की सूचना से भी अवगत हो चुके हैं। उन घटनाओं के बाद से भारतीय छात्र-छात्राएँ युक्रेन मे भयभीत दिख रही हैं। इसे हम युक्रेन से लौटे हुए भारतीय विद्यार्थियों के चेहरे के आश्चर्ययुक्त और भयाक्रान्त भावों से समझ सकते हैं। युक्रेन मे रह रहे भारतीय छात्राओं ने वीडियो जारी करके बताया है कि तीन छात्राएँ युक्रेन से ग़ायब हो चुकी हैं। एक छात्रा का कहना है, ”युक्रेन के इवोनियो से होकर रोमानिया की सीमा पर हम छात्र-छात्राएँ पहुँची हैं, जहाँ हमारे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जा रहा है; हमे बुरी तरह से लातों से मारा जाता है; नाइजीरिया और दक्षिणअफ्रीका के विद्यार्थी हमारी आँखों मे मिर्ची छिड़ककर उन्हें परेशान कर रहे हैं और विरोध करने पर हाथापाई कर रहे हैं। हमारी सहायता के लिए कोई नहीं है। अब हम उस बुरे बरताव को बरदाश्त करने के लिए बाध्य हैं।” वीन्नित्स्या मेडिकल युनिवर्सिटी की एम० बी० बी० एस० तृतीय वर्ष की एक छात्रा ने अपनी व्यथा-कथा बतायी थी– युनिवर्सिटी से १०० भारतीय विद्यार्थी दो बसों मे सवार होकर रोमानिया के लिए निकले थे। उनमे से कई छात्राएँ सीमा पार करके रोमानिया पहुँच गयी थीं; किन्तु उनमे से जो विद्यार्थी पीछे रह गये थे, उन पर युक्रेन के पुलिसकर्मियों और सैनिकों ने अकारण डण्डों से हमले किये थे। इतना ही नहीं, युक्रेन के नागरिकों को बाहर आने दिया जा रहा है, जबकि भारतीयों को रोका जा रहा है। भारतीय विद्यार्थियों के पास खाने-पीने का जो भी सामान बचा हुआ है, नाइजीरियाई विद्यार्थी छीन ले रहे हैं। नई दिल्ली के इन्दिरा गांधी इण्टरनेशनल हवाई अड्डे के बाहर खड़ी दिव्यांशी सचान ने आपबीती बताते हुए फफक पड़ी– २४ फ़रवरी को युक्रेन-रूस के बीच ‘वार’ शुरू हो चुका था; हम सब डर गये थे कि अब क्या होगा; हम दो दिनो तक ‘इण्डियन एम्बेसी’ को ‘काल’ करते रहे; किसी ने फ़ोन नहीं उठाया; हम अपना सारा सामान उठाकर १५ कि० मी० पैदल चले। हमने चार-चार रातें खुले आसमान के नीचे बर्फ़बारी के बीच ‘माइनस १०’ और ‘२० डिग्री’ मे काटी; एक बार मे केवल चार इण्डियन्स को बॉर्डर पार कराया जा रहा था। हम कुचले गये; हमे पीटा गया। हमारी मदद के लिए एम्बेसी का कोई अधिकारी मौजूद नहीं था। जब हम मदद के लिए गुहार लगा रहे थे तब सरकार ‘पी० आर०’ मे जुटी थी। अब सरकार ‘इवेक्यूवेशन’ के नाम पर अपना प्रचार कर रही है; ‘क्रेडिट’ ले रही है। शर्म भी नहीं आती। हम जब वास्तविकता दिखाने के लिए वीडियो अपने दोस्तों के पास और फेसबुक पर डालते थे तब हमे भारतीय दूतावास से वीडियो हटाने के लिए धमकाया जाता था।” एक अन्य छात्रा का आक्रोश देखते ही बनता है। उसका कहना है– जब हम ख़ुद रोमानिया बॉर्डर क्रॉस कर सकते हैं तब ख़ुद अपना टिकट कराकर वापस भी आ सकते हैं। सारा संघर्ष हमने किया और आख़िरी वक़्त सरकार के लोग ‘क्रेडिट’ ले रहे हैं।

निश्चित रूप से यह स्थिति भारतीय विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त शोचनीय है। आश्चर्य की बात है! युक्रेन-स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारी ‘सरकारी दिव्यांग’ बने हुए हैं। विद्यार्थी कथित दूतावास के अधिकारियों के पास फ़ोन करते हैं; परन्तु कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती। ऐसे विद्यार्थियों की बहुत बड़ी संख्या है, जो ७० कि० मी० पैदल ही चलकर युक्रेन की सीमा से बाहर आ चुके हैं। उनमे से कोई रोमानिया पहुँचा है तो कोई पोलैण्ड; किन्तु वहाँ पहुँचे भारतीय विद्यार्थियों के द्वारा लगातार गिड़गिड़ाते हुए उनकी सहायता की माग वहाँ स्थित भारतीय दूतावासों के अधिकारियों से करने पर भी कोई हाथ मदद के लिए नहीं बढ़ रहा है। दूसरी ओर, रोमानिया की जनता ने निराश्रित भारतीय विद्यार्थियों की सहायता की थी :– ठहरने के लिए जगह दी; भरपेट भोजन कराया था। जब रोमानिया मे भारतीय दूतावास के लोग उन विद्यार्थियों से मिलते थे तब उनके साथ ‘बेहूदा’ व्यवहार करते थे। ऐसा आरोप विद्यार्थियों ने लगाये हैं। इतना ही नहीं, भारतीय दूतावास के लोग ने कहा– जो दूतावास का ‘बाथरूम’ साफ़ करेगा, उसे हम पहले भारत ले जायेंगे और बाक़ी लोग को बाद मे। दूतावास पर यह भी आरोप है।

यदि मोदी-सरकार के युक्रेन और रूस के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं तो वे दोनो सरकारों के राजनयिकों से वार्त्ता करके युद्ध-विराम कराने की बात प्रभावकारी ढंग से क्यों नहीं कर पाये थे, ताकि वहाँ फँसे भारतीय विद्यार्थियों को सुरक्षित वापस लाया जा सके?

युद्ध के इस पूरे प्रकरण मे कथित मोदी-सरकार ने जिस तरह से अपनी तटस्थता की नीति अपनायी है, उससे अलग हटकर न!उसे मुखर होकर अपने विद्यार्थियों और अन्य नागरिकों को वहाँ से निकालने का प्रयास करना होगा। उसकी इसी ‘तटस्थता की नीति’ का दुष्परिणाम भारतीय विद्यार्थियों को आज भोगना पड़ रहा है। यही कारण है कि युक्रेन के साथ भारत को खड़ा होते न देखकर, युक्रेनी प्रशासन और सेना भारतीय विद्यार्थियों की सहायता करने मे कोई रुचि लेती नहीं दिख रही है। रेलगाड़ी मे सवार होकर सुरक्षित देश रूस जाने के लिए ‘अभारतीय नागरिकों’ को प्रमुखता दी जा रही है। युक्रेनी सैनिक भारतीय विद्यार्थियों को रेलगाड़ी मे चढ़ने पर गोली मारने की धमकी देते हुए, हवाई फ़ायर करते हुए दिख रहे हैं।

पहली ओर, भारतीय विद्यार्थी युक्रेन और उसकी सीमान्त क्षेत्रों मे बुरी तरह से फँस चुके हैं; दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी की मोदी-सरकार का केन्द्रीय संसदीय कार्यमन्त्री प्रह्लाद जोशी जले पर नमक छिड़कते हुए कहता है, “विदेश जानेवाले ९० प्रतिशत स्ट्युडेण्ट्स भारत मे मेडिकल की प्रवेश-परीक्षा नीट मे ही फेल हो जाते हैं।” अब प्रश्न है, संस्कारहीन मन्त्री को ऐसे संवेदनशील अवसर पर ऐसा कथन करने की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है? हमे नहीं भूलना चाहिए कि ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ का सरकारी कर्मचारी प्रह्लाद जोशी ऐसे ही उल-जुलूल बोलने के लिए बदनाम रहा है। उसे लज्जा आनी चाहिए कि ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ मे दायित्वपूर्ण पद पर काम करनेवाला मन्त्री मारे गये केरल और पंजाब के विद्यार्थी के माता-पिता के साथ संवाद स्थापित करने के स्थान पर अपनी सरकार की नाकामी को छिपाना चाहता है। क्या उस क्षुद्र मन्त्री को मालूम नहीं है कि मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए जितना अधिक शुल्क भारत मे लिया जाता है, उससे बहुत ही कम धनराशि मे विद्यार्थी युक्रेन मे रहकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर डिग्री हासिल कर सकते हैं। देखा जाये तो दो भारतीय विद्यार्थियों– नवीन और चन्दन की हत्या के लिए कथित मोदी-सरकार सीधे उत्तरदायी है; क्योंकि उसका विदेश-मन्त्रालय और भारतीय दूतावास भीषण युद्ध मे भी अपने नागरिकों के साथ नहीं दिखा था। युक्रेन मे भारतीय दूतावास की बेहद घृणित भूमिका दिख रही है। अब, जब भारतीय विपक्षी दलों और माता-पिता-अभिभावकजन ने युक्रेन मे रह रहे भारतीय विद्यार्थियों को किसी भी क़ीमत पर लाने के लिए दबाव बढ़ाया और भारत के आमजन मोदी-सरकार की उत्तरप्रदेश-चुनाव को प्राथमिकता देते हुए, युक्रेन मे फँसे भारतीय विद्यार्थियों की उपेक्षा के प्रति आक्रोश दिखने पर विदेश-मन्त्रालय की आँखें खुली हैं। यही कारण है कि २ मार्च को विदेश-मन्त्रालय ने १ घण्टा के भीतर दो ‘अर्जेण्ट ऐडवाइज़री’ जारी करते हुए कहा था– भारतीय विद्यार्थी हर हालत मे ‘खारकीव’ से निकलें। मोदी-सरकार के सूत्रों पर यदि विश्वास किया जाये तो १० मार्च तक सभी भारतीयों को लाने की योजना है और रूस ने ५ मार्च को एक निश्चित अवधि के लिए दो स्थानो :– मारियूपोल और वाल्नोवाखा पर ‘युद्ध-विराम’ की घोषणा कर दी है, ताकि युक्रेन में रह रहे लोग अपने को सुरक्षित कर सकें। ऐसे मे, मोदी-सरकार के लिए अपने सभी नागरिकों को सुरक्षित स्वदेश लाने का पूरा समय मिल चुका है।

युक्रेन मे जिस तरह से भारतीय दूतावास की ओर से भारतीय छात्र-छात्राओं के साथ लज्जाजनक व्यवहार किया जा रहा है, वह शोचनीय है। यदि मोदी-सरकार के दूतावास के अधिकारी चाहते तो “त्राहि माम्” की पुकार कर रहे विद्यार्थियों को सुरक्षित स्थानो पर ले जा सकते थे, जबकि उन्होंने वैसा किया नहीं। आख़िर मोदी-सरकार के विदेश-मन्त्रालय का मन्त्री और उसके अधिकारी किस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे?

मोदी-सरकार के दावे पर यदि विश्वास किया जाये तो अभी तक ऑपरेशन गंगा’ और भारतीय सेना के ‘मिशन इम्पॉसिबिल’ के अन्तर्गत १० हज़ार से अधिक विद्यार्थी स्वदेश लाये जा चुके हैं। मोदी-सरकार पोलैण्ड और रोमानिया के मार्ग से भारत लाने की बात कर रही है; लेकिन व्यावहारिक धरातल पर जिस रूप मे उसे सफलता मिलनी चाहिए, मिल नहीं रही है। कथित ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ ने फ्रांस, रूस के राष्ट्रपति से वार्त्ता करके देख ली है। बहरहाल २ मार्च को रूस ने भारतीय छात्रों और अन्य नागरिकों को निकलने के लिए ६ घण्टे का समय दिया था; क्योंकि युक्रेन मे बीच-बीच मे बजाये जा रहे सायरन इस सूचना को ज़ाहिर कर रहे थे– किसी भी समय रूसी सेना आक्रमण कर सकती है; सुरक्षित बंकरों मे छिप जायें। ज्ञातव्य है कि लगभग ३० हज़ार भारतीय विद्यार्थी और अन्य भारतीय नागरिक -८ डिग्री के मौसम मे युक्रेन मे रह रहे हैं। रूस-युक्रेन-युद्ध की विभीषिका से आक्रान्त मध्यप्रदेश की निवासिनी छात्रा दीपिका के अनुसार, ३ मार्च को युक्रेन के ‘सुमी’ नामक स्थान पर लगभग १,००० भारतीय विद्यार्थी स्वदेश लौटने के लिए बेचैन हैं। वे सभी पिछले ९ दिनो से बंकरों मे छिपकर अपनी जान बचाते आ रहे हैं, जबकि ३ मार्च को भारतीय समयानुसार रात्रि के ९.३० से लगातार सुमी पर बम गिराये जा रहे थे। इस समय युक्रेन और युक्रेन की सीमा-पार क्षेत्रों मे लगभग २० हज़ार की संख्या मे भारतीय छात्र-छात्राएँ फँसी हुई हैं, जो स्वदेश लौट नहीं पा रही हैं। लगातार जन-धन की क्षति और गोला-बारूद के बीच वे सभी भारतीय विद्यार्थी किसी भी तरह से अपने देश मे लौट आना चाहते हैं।

कीव के रेलस्टेशन के पास १२ ऐसे विद्यार्थी हैं, जो दृष्टिबाधित दिख रहे हैं। वे पिछले दो दिनो से फँसे हुए दिख रहे थे। उनमे से कई विद्यार्थी भारतीय दूतावास के पास खड़े होकर इस आशा मे उसके भवन की ओर टकटकी लगाये दिख रहे थे कि उस भवन से कोई उनका ‘तारणहार’ दिख जाये, जबकि वे सभी विद्यार्थी हाथ मलते हुए दिखायी दे रहे थे।

हमे नहीं भूलना चाहिए कि जब कोई विषय अति गम्भीर हो तो सरकार को विपक्षी दलों को प्रतिनिधियों के साथ बैठकर विचार-विमर्श करना चाहिए, जिससे कि ठोस विकल्प दिखने लगे; किन्तु पिछले सात वर्षों मे हमने देखा है कि मोदी-सरकार ने अपनी दूरदर्शिता दिखाने की ज़रूरत नहीं समझी।

लेखक राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय विषय-विश्लेषक और भाषाविज्ञानी हैं।
सम्पर्क– 9919023870
सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ मार्च, २०२२ ईसवी।)