आज (९ मई) पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि

जन्मतिथि– ९ मई, १८६४ ईसवी; मृत्युतिथि– २१ दिसम्बर, १९३८ ईसवी

हिन्दी को अनुशासन की छड़ी से शुद्ध बनानेवाले आचार्य द्विवेदी जी

संयोजक और समन्वयक– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद् और समीक्षक)

दशकों से संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, अँगरेज़ी, अरबी, फ़ारसी-भाषाओं और अवधी, ब्रज की बोलियों के मर्मज्ञ, हिन्दी-साहित्य के प्रथम आचार्य पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर दशकों से मतभेद बना हुआ है। ऐसा इसलिए कि कहीं ५ मई और ६ मई का विवरण प्राप्त होता है तो कहीं ९ मई और १५ मई का; परन्तु सम्पूर्ण देश में जहाँ कहीं भी आचार्य जी के जन्मतिथि-समारोह का आयोजन किया जाता है, वह तिथि ९ मई होती है। दशकों-पूर्व आचार्य जी के जन्मस्थान’दौलतपुर’ (रायबरेली)में हमें जाने का अवसर प्राप्त हुआ था, तब हमें आचार्य जी की जन्मतिथि ९ मई बतायी गयी थी।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि उनका मूल नाम महावीर सहाय द्विवेदी था; क्योंकि उनके पिताश्री का नाम श्री रामसहाय द्विवेदी था। जब उनका पाठशाला में प्रवेश कराया गया था तब वहाँ के प्रधानाध्यापक ने भूलवश ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी’ नाम लिख दिया था, जो भूल होते हुए भी हिन्दीसाहित्य के इतिहास में एक सुखद संयोग बन चुका है।

वास्तव में, आचार्य द्विवेदी जी एक विलक्षण साहित्यशिल्पी होने के साथ ही एक महामानव भी थे। एक बार की बात है। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी अपने खेतों की देख-रेख करने के लिए जा रहे थे। तभी उन्हें किसी महिला का करुण क्रन्दन सुनायी दिया था। वे तत्काल उस महिला के पास आ पहुँचे। उन्होंने रोने का कारण पूछा तब उस महिला ने बताया कि उसे साँप ने काट लिया है। द्विवेदी जी ने वहीं पड़े हँसिये को उठा लिया और जहाँ साँप ने डँसा था, उस स्थान पर हँसिये से चीरा लगा दिया, जिससे सारा विष धीरे-धीरे बाहर आने लगा था, फिर उन्होंने अपना यज्ञोपवीत उतारा और उसे तोड़कर चीरा लगाये हुए हिस्से के थोड़ा ऊपर उससे कसकर बाँध दिया, जिससे कि विष सारे शरीर में फैलने न पाये। उसी बीच, गाँव के ही कुछ लोग वहाँ आ पहुँचे। उन लोग ने द्विवेदी जी से कहा, “आप ब्राह्मण हैं और यह महिला अछूत है। आपने पवित्र जनेऊ को तोड़कर इसके पाँव में बाँधकर धर्म का अपमान किया है।” इस पर द्विवेदी जी का उत्तर था, ” मनुष्य के जीवन की रक्षा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। जो जनेऊ इस स्त्री की रक्षा नहीं कर सकेगा, वह मेरी रक्षा क्या करेगा?”

इस मानवीय घटना से यह भी रेखांकित होता है कि वे नारी का अतीव सम्मान करते थे। उनकी पत्नी एक सामान्य गृहिणी थीं। वे गाँव में ही रहा करती थीं। वहीं हनुमान जी की एक मूर्ति स्थापित थी। आगे चलकर, उनकी पत्नी ने उस मूर्ति के चारों ओर एक चबूतरे का निर्माण करा दिया था। जब द्विवेदी जी दौलतपुर पहुँचे थे तब उनकी पत्नी ने बिना उनका नाम लिए उनके नाम के पर्याय का प्रयोग करते हुए कहा, “देखो हनुमान् जी! मैंने तुम्हारा चबूतरा बनवा दिया है।” इस पर मुसकुराते हुए द्विवेदी जी ने कहा, “अरी भाग्यवान्! तुमने मेरा चबूतरा बनवा दिया है तो मैं तुम्हारे लिए मन्दिर बनवा दूँगा।” १९१२ ईसवी को उनकी पत्नी का गंगानदी में डूबने के कारण निधन हो गया था। द्विवेदी जी ने अपने पत्नी को दिये गये वचन के अनुसार, अपने घर के आँगन में एक मन्दिर का निर्माण कराया था, जिसमें ज्ञानदायिनी माँ शारदा और धनदात्री माँ लक्ष्मी की मूर्तियों की स्थापना करायी थीं, जिनके मध्य में अपनी पत्नी की मूर्ति की प्रतिष्ठा कर “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” को मूर्त रूप दिया था। उन्होंने उस मन्दिर का नाम ‘स्मृतिमन्दिर’ रखा था। गाँव के लोग, पट्टीदार आदिक ने मानवीय मूर्ति के साथ दैवीय मूर्ति की स्थापना करने का घोर विरोध करते हुए कहा था, ” इ कलजुगी दुबौना सठियाय गा हय।” दूसरी ओर, द्विवेदी जी तनिक विचलित नहीं हुए थे।

निस्सन्देह, वे ‘महावीर’ थे। अपने बनाये हुए पथ पर निर्भीकता और सुदृढ़ता के साथ “चरैवेति-चरैवेति” को अंगीकार कर बढ़ते रहे। यही कारण है कि वे अपने उद्देश्य, ध्येय तथा लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कण्टकाकीर्ण मार्ग प्रशस्त करते हुए, अपने गन्तव्य तक पहुँचे थे।

यहाँ हमने आचार्यत्व की सिद्धि करनेवाले अध्यात्म, अर्थ, इतिहास, दर्शन, धर्म, राजनीति, विज्ञान, संस्कृति, समाज, साहित्य आदिक विषयों पर गम्भीर कृतियों के प्रणयन और महाग्रन्थों के अनुवाद करनेवाले पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के जीवन-कार्यों पर अनेक विषय-विशेषज्ञों के विचार प्रस्तुत किये हैं । आप इन्हें पढ़ें, समझें तथा अनुभव करें।

आचार्य जी ‘सरस्वती-साधक’ थे
— विभूति मिश्र
(प्रधानमन्त्री– हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग)

विभूति मिश्र

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की ऐतिहासिक साहित्ययात्रा से प्रभावित होकर ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग’ ने द्विवेदी जी को ‘साहित्य वाचस्पति’ सम्मान से समलंकृत किया था। उन्होंने इलाहाबाद में इण्डियन प्रेस से प्रकाशित होनेवाली ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से सम्पूर्ण देश में जो साहित्यिक क्रान्ति उत्पन्न की थी, उसकी कोई समता नहीं। उस पत्रिका के माध्यम से हिन्दीभाषा और व्याकरण की उपेक्षा कर लेखन करनेवालों को फटकार लगाते हुए, समुचित मार्ग पर ला खड़ा कर दिया था। देखा जाये तो ‘सरस्वती’ के बल पर उन्होंने समूचे देश में एक ऐसा वातावरण बनाया था, जिससे प्रभाव ग्रहण कर कवि, कहानीकार, निबन्धकार आदिक देश के साहित्य-पटल पर उभरने लगे। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, राय देवी प्रसाद, हरिऔध आदिक की काव्यरचनाओं को ‘सरस्वती’ में स्थान दिये थे। उन्होंने बंगमहिला की ‘दुलाईवाला’, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की ‘उसने कहा था’, प्रेमचन्द की ‘सौत’ आदिक कहानियों को प्रकाशित कर उन्हें कथाकार के रूप में स्थापित किया था। इतना ही नहीं, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का ‘कविता क्या है?’, कामता प्रसाद गुरु का ‘हिन्दी-व्याकरण’, सरदार पूर्ण सिंह के लाक्षणिक निबन्धों का प्रकाशन कर अपनी कुशल सम्पादनकला को स्थापित किया था। तभी तो आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी को कहना पड़ा था, “द्विवेदी जी के सरस्वती-सम्पादन का इतिहास अनेक आन्दोलनों का इतिहास है।”

आचार्य द्विवेदी जी संस्कृत-साहित्य के गहन अध्येता थे
— प्रेरणा पाण्डेय
(शोधच्छात्रा– राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्– मानित विश्वविद्यालय), प्रयागराज।

प्रेरणा पाण्डेय

आचार्य द्विवेदी जी यद्यपि हिन्दी-साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक माने गये हैं तथापि उनकी प्रथम आलोचनात्मक कृति श्रीहर्ष के संस्कृत-महाकाव्य ‘नैषधीयचरितम्’ पर आधारित ‘नैषधचरित’ है। उनकी अन्य आलोचनात्मक कृतियाँ हैं :– ‘नाट्यशास्त्र’, ‘कालिदास और उनकी कविता’, ‘कालिदास की निरंकुशता’ ‘विक्रमांकदेव चरितचर्या’आदिक। उनका मत था– कोई भी साहित्य कितना ही महान् क्यों न हो, मीमांसा की अपेक्षा रखता है। यही कारण है कि द्विवेदी जी ने कालिदास की न्यूनता का निडर होकर उल्लेख किया है। आचार्य जी ने साहित्य को ‘ज्ञान की राशि का सञ्चित कोश’ कह कर पुकारा था। वे अनुवादकला के मर्मज्ञ थे। यही कारण है कि ‘कुमारसम्भवसार’, ‘ऋतुतरङ्गिणी’, ‘गङ्गालहरी’, ‘वेणीसंहार’ आदिक अनूदित कृतियों में उनकी दक्षता देखते ही बनती है। द्विवेदी जी ने अपनी रचनाओं में परिचयात्मक शैली, आलोचनात्मक शैली तथा गवेषणात्मक शैली को अपनाकर हिन्दी-साहित्य में अभूतपूर्व श्रीवृद्धि की है। उन्होंने कालिदास कृत ‘रघुवंशम्’ पर ‘कालिदास का भारत’ तथा खण्डकाव्य ‘मेघदूतम्’ पर ‘मेघदूत’ नामक निबन्ध भी लिखे थे। द्विवेदी जी के शब्दों में कहें — यदि कोई व्यक्ति उज्जयिनी के महाकालेश्वर और कैलास पर्वत पर विराजित पार्वती-शिव का दर्शन न किया हो तो ‘मेघदूत’ में किया जा सकता है। जहाँ आचार्य द्विवेदी जी ने अन्य विद्वज्जन और संस्कृत-साहित्य के प्रति विमुख साहित्यकारों के संस्कृत-काव्यों का अध्ययन कर उन पर आलोचनात्मक दृष्टिपात करने के बाद अपना पक्ष भी प्रस्तुत किया था।

आचार्य जी ने हिन्दी को ‘अँगुली’ पकड़ कर चलना सिखाया
— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आचार्य जी के स्वभाव और भाषा-परिष्कार के प्रति उनकी हठी प्रवृत्ति का अध्ययन करता हूँ तब स्वयं के भीतर उन सभी गुणावगुण (आलोचना) को पाता हूँ। मेरे भीतर का भी सम्पादक किसी की रचना में गुणवत्ता न पाने पर, रचनाकार में सम्भावनाओं को टटोलते हुए, रचना में आमूल-चूल परिवर्तन करने का पक्षधर रहा है। आचार्य जी ने भी वैसा ही किया था। इस विषय पर दो मत नहीं हो सकते कि ऐसे लोग के समर्थक कुछ ही अँगुलियों के पोरों पर रहते हैं। यह अलग विषय है कि उसके देहावसानोपरान्त उसका गुणगान करनेवाले बहुसंख्यक दिखते हैं।

पण्डित द्विवेदी जी की भाषानिष्ठा का ही परिणाम-प्रभाव था कि उन्हें इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद के स्वामी बाबू चिन्तामणि घोष ने उनके पास ‘वेतनिक’ सम्पादक के रूप में ‘सरस्वती’ का सम्पादन करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा था। इसके पीछे भी एक घटना है। इण्डियन प्रेस से एक पुस्तक का मुद्रण-प्रकाशन हुआ था, जो विद्यालयों में अध्ययन करने के लिए स्वीकृत हो चुकी थी। संयोगवश, वह पुस्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के हाथों लग गयी, फिर क्या था, अपने स्वभाव के अनुरूप वे एक-एक शब्द को पढ़ते गये। उस पुस्तक में बड़ी संख्या में अशुद्धियाँ थीं। उन्होंने उसकी तीक्ष्ण समीक्षा करने के बाद उसकी तीन प्रतियाँ बनायीं। उसकी पहली प्रति उन्होंने शिक्षाविभाग, दूसरी प्रति इण्डियन प्रेस के स्वामी बाबू चिन्तामणि घोष को भेजी थी तथा तीसरी अपने पास रख ली थी। घोष बाबू ने उस समीक्षा को गम्भीरता से लिया था, फलत: उन्होंने द्विवेदी जी को ‘सरस्वती’ का सम्पादन करने के लिए अपने यहाँ निमन्त्रित किया था। यहीं से देश के स्वनामधन्य रचनाकारों के भाषापरिष्कार का कार्य आरम्भ हो चुका था। वे कारक-विभक्ति, लिंग, वचन, वाक्यविन्यास आदिक व्याकरणिक अंगों को स्वस्थ और समृद्ध करते हुए, तत्कालीन साहित्यकारों का सम्यक् मार्गदर्शन करने में लग गये थे। भारतेन्दु-युग में भाषा के प्रति जो शिथिलता दिख रही थी, उसके प्रति आचार्य जी के मन में एक प्रकार की बेचैनी थी। यही कारण है कि उन्होंने साहित्य-साधकों का भाषानिर्देश करने और कृतियों में भाषा-व्याकरण की अशुद्धियों से अवगत कराने से पीछे नहीं हटते, तभी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को स्वीकार करना पड़ा था, “द्विवेदी जी के इस शुद्ध प्रभाव का स्मरण तब तक बना रहेगा जब तक भाषा के लिए शुद्धता आवश्यक समझी जायेगी।”

—————————————-prithwinathpandey@gmail.com