“अतीव सम्भावनाओँ से विकसित था, उस समय का साहित्यिक परिवेश”– महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा से भेंटवार्त्ता करते डॉ॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय

महादेवी वर्मा के निधन-दिनांक (११ सितम्बर) पर विशेष प्रस्तुति

प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से महादेवी वर्मा के निधन-दिनांक (११ सितम्बर) की पूर्व-संध्या मे ‘सारस्वत सदन’, आलोपीबाग़, प्रयागराज की ओर से आयोजित एक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद के अन्तर्गत व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का एकल कार्यक्रम हुआ था, जिसमे उन्होँने बताया था कि वे महादेवी वर्मा को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद फरवरी, १९८२ ई० मे उनके अशोकनगर-स्थित घर पहुँचे थे। आचार्य ने बताया कि लगभग नौ मिनट तक प्रतीक्षा सहने के बाद वे आयीँ और आते ही बोल पड़ीँ, ”भाई! मेरी हालत देख ही रहे हो; इण्टरव्यू कैसे दे पाऊँगी?” वे हठी तो थीँ ही; मै भी कम नहीँ था। देवी जी अन्तत:, झुकीँ।


आचार्य का पहला प्रश्न था, “जब आपने काव्यक्षेत्र मे प्रवेश किया था तबका साहित्यिक परिवेश कैसा था?” महादेवी ने बताया था, “१९१७ मे मै यहाँ आयी थी। हाँ, इन्दौर से आयी थी। ‘चाँद’ निकलता था। मेरी कई रचनाएँ छपीँ भी। सौभाग्य से सुभद्रा जी (सुभद्राकुमारी चौहान) के दर्शन हो गये थे। काफ़ी दिनो तक हम दोनो मिलकर कविता लिखते थे; मगर फिर वो चली गयीँ।”


आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने जो अगला प्रश्न था, उसे सुनकर वे कुछ उद्विग्न-सी दिखीँ। उनका प्रश्न था, “आलोचकोँ और समीक्षकोँ ने आपको भी नहीँ बख़्शा। उनका मानना है कि जिस ‘यामा’ कृति पर आपको ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ दिया गया है, उससे छायावादी कवियोँ की परम्परा मे स्थान देने मे कुछ अटपटा-सा लगता है। आप कुछ कहना चाहेँगी?” महादेवी का कहना था, “देखिए! हर व्यक्ति की दृष्टि अपनी निजी होती है। वह जिसको जैसा चाहता है वैसा ही मूल्यांकन करने का प्रयास करता है। आजका आलोचक ‘आलोचना’ करने के लिए लिखता है। वह विषयोँ की गहराई तक उतरे वा न उतरे, उसके लिए कोई अन्तर नहीँ पड़ता।”


फिर आचार्य ने अगला प्रश्न किया था, ”अब, जब आप अपनी पहले की कृतियोँ को देखती हैँ तब क्या ऐसा नहीँ लगता, उनमे और सुधार कर परिष्कृत किया जाये?” महादेवी ने उत्तर देते समय जो मुद्रा बनायी थी, उससे लगा कि वे अतीतलोक मे पहुँच चुकी थीँ। वे कहने लगीँ,
“अब तो आश्चर्य होता है, उस समय छोटी-सी अवस्था मे कैसे मैने सब लिख लिया। देखिए, भाव ‘भाव’ होता है। उस समय जो भाव थे, उतने परिपक्व नहीँ थे जितने कि अब हैँ, फिर यह तो समय की बात है। समय अच्छा था, सब लिख दिया। अब उतना कहाँ सम्भव है।”


इनके अतिरिक्त आचार्य ने और भी कई प्रश्न किये थे, जिन्हेँ सुनकर आयोजन मे उपस्थित श्रोता और दर्शकगण मन्त्रमुग्ध हो उठे थे।