कहानी : रूहानी फकीर बाबा

ढोंगी बाबाओं पर आधारित कहानी का पार्ट-- 1

कल्लूपुर गाँव में शाम जल्दी उतरती थी।

सूरज डूबने से बहुत पहले खेतों की पगडंडियाँ सुनसान होने लगतीं, बैलों की घंटियाँ दूर कहीं बजतीं और घरों के दरवाजे एक-एक करके बंद होने लगते। मगर गाँव से करीब आधा कोस बाहर, पुराने पीपल और नीम के पेड़ों के बीच बनी पीर बाबा की मजार पर शाम के बाद भी चहल-पहल रहती।

मजार छोटी थी, मगर उसका रुतबा बड़ा था।

किसी की मन्नत पूरी हो जाए तो चादर चढ़ती। किसी की गोद भर जाए तो मिठाई बँटती। किसी का बीमार बच्चा बच जाए तो लोग कहते—पीर बाबा की मेहरबानी हुई।

और इसी आस्था के बीच धीरे-धीरे एक और नाम जुड़ गया था।

शरीफ।

विडंबना यह थी कि शरीफ नाम का वह आदमी शरीफ बिल्कुल नहीं था।

कल्लूपुर के लोग उसे बचपन से जानते थे। चोरी, झूठ, झगड़ा, छेड़खानी—ऐसा कोई छोटा-मोटा ऐब नहीं था जो उसके खाते में न हो। कभी किसी के खेत से गन्ना गायब, कभी किसी की बकरी खुली मिली और अगले दिन पता चलता कि वह शरीफ के घर के पीछे बँधी है।

लोग गालियाँ देते, मगर उससे उलझने से बचते।

क्योंकि शरीफ लड़ाकू था और उससे भी ज्यादा चालाक।

वह कभी सामने से वार नहीं करता था। पहले आदमी की कमजोरी तलाशता, फिर उसी कमजोरी को पकड़कर उसे अपने पक्ष में कर लेता।

मजार उसकी सबसे बड़ी पनाहगाह बन गई थी।

वह वहाँ घंटों बैठा रहता। कभी आँखें बंद किए, कभी हाथ में तस्बीह घुमाते हुए, कभी किसी आने वाले को बड़े गौर से देखते हुए।

धीरे-धीरे उसने बोलने का अंदाज भी बदल लिया।

पहले जहाँ वह गाली देकर बात करता था, अब धीमी आवाज में कहता—

“सब्र करो… ऊपर वाले की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता।”

लोग प्रभावित होने लगे।

एक दिन पास के गाँव की एक महिला चादर चढ़ाने आई। उसके साथ उसकी सास थी। महिला की शादी को कई साल हो चुके थे और उसके कोई संतान नहीं थी।

शरीफ ने उसे देखते ही कहा—

“अगली बार अकेली मत आना।”

महिला ने चौंककर पूछा—

“क्यों?”

शरीफ मुस्कराया।

“भतीजा भी साथ लाना।”

महिला की सास की आँखें चमक उठीं।

“मतलब…?”

शरीफ ने आँखें बंद कर लीं।

“जो समझना है, समझ लो। दुआ कर दी है।”

कुछ महीनों बाद उस महिला के घर बेटे का जन्म हुआ।

बस फिर क्या था।

कल्लूपुर और आसपास के गाँवों में बात फैल गई—

शरीफ की दुआ लगती है।

एक घटना दूसरी से जुड़ती गई। किसी को बेटा हुआ। किसी की बीमारी ठीक हो गई। किसी की खोई हुई चीज मिल गई।

हर घटना के साथ शरीफ की प्रतिष्ठा बढ़ती गई।

लोगों ने उसे फकीर कहना शुरू कर दिया और शरीफ ने यह नाम स्वीकार कर लिया।

लेकिन उसके लिए फकीरी आस्था नहीं थी।

वह एक ढाल थी।

एक ऐसी ढाल जिसके पीछे वह पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया था।