भारतेन्दु हरिश्चन्द के जन्मदिनांक (९ सितम्बर) की पूर्व-संध्या मे ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज का राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद-आयोजन सम्पन्न
प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से भारतेन्दु हरिश्चन्द के जन्मदिनांक (९ सितम्बर) की पूर्व-संध्या मे एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था, जिसमे कई राज्योँ के प्रबुद्धजन की सहभागिता रही।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान, वाराणसी की डॉ० मुक्ता ने कहा– भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने समकालीन समाज की प्रवृत्ति, विसंगति और अन्तर्विरोध की पहचान कर अपने साहित्य के माध्यम से उनका परिष्कार करने की चेष्टा की।
नागरी प्रचारिणी सभा, देवरिया के वरिष्ठ उपाध्यक्ष इन्द्रकुमार दीक्षित ने कहा– भारतेन्दु जी ने लेखन के ज़रिये जन-जन मे देशप्रेम और भाषाप्रेम की भावना का संचार किया, जो आगे भारत के स्वातन्त्र्य-संघर्ष का उद्दीपन बना।
पुणे की विज़िटंग स्कॉलर डॉ० नीलम जैन ने बताया– भारतेन्दु ने अपने नाटकोँ और कविताओँ मे समाज की कुरीतियोँ और विडम्बनाओँ को उजागर किया। उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीँ, बल्कि युगीन सामाजिक अन्तर्विरोधों का दर्पण हैँ।’
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– भारतेन्दु ने अत्यन्त सूक्ष्मतापूर्वक ब्रिटिशराज की नीतियोँ को परखा और पराधीन भारत का आह्वान किया कि वे सामाजिक विकृति और पराधीन मानसिकता से बाहर आकर मुक्त वातावरण मे आकर श्वास लेने का अभ्यासी बने।
आर्यकन्या डिग्री कॉलेज, प्रयागराज की पूर्व-प्राध्यापक डॉ० कल्पना वर्मा ने कहा– भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के जनकल्याण के कार्योँ के प्रति कृतज्ञता जतायी तो उनकी शोषण-नीति का खुला विरोध भी किया।
शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गढ़ाकोटा, सागर के प्राचार्य डॉ० घनश्याम भारती ने कहा– भारतेन्दु हरिश्चन्द का साहित्य भारतीय समाज को एक नयी ऊर्जा और स्फूर्ति का संदेश देता है; क्योँकि वे सामाजिक अन्तर्विरोध की परख करने मे सिद्धहस्त थे।
सी० एम० पी० डिग्री कॉलेज, प्रयागराज मे हिन्दी-प्राध्यापक विभाग डॉ० आभा त्रिपाठी ने कहा– उन्होँने अपने समय, परिवेश और समाज को भलीभाँति पहचाना तथा साम्राज्यवाद और सामाजिक अन्तर्विरोध पर एकसाथ चोट की।
श्री राघवेन्द्र सिंह हजारी शासकीय महाविद्यालय, हटा-दमोह की हिन्दी-सहायक प्राध्यापक आशा राठौर ने बताया– पुरातन का अनुकरण और नवीन के प्रति आग्रह के कारण उनकी विचारधारा मे वास्तविक अन्तर्विरोध न होते हुए भी, कभी-कभी अन्तर्विरोध का अनुभव होता है।
राजभाषा-कार्यालय रक्षा लेखा नियन्त्रक (आर्मी), मेरठ छावनी के सहायक निदेशक के० पी० पुण्डीर ने कहा, भारतेन्दु ने देश की ग़रीबी, पराधीनता, शासकोँ के अमानवीय शोषण के चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया।
सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ, विद्यानगर, गुजरात मे हिन्दी-विभागाध्यक्ष प्रो० दिलीप मेहरा ने कहा–भारतेन्दु ने तत्कालीन भारतीय समाज मे दिख रही कुरीतियोँ, पाखण्ड, अन्धविश्वास, अन्याय, अशिक्षा, ग़रीबी, बेरोज़गारी आदिक को अपने साहित्य का विषय बनाकर समाज-जागरण का प्रयास किया था।
भारतीय जीवन बीमा, राँची, झारखण्ड मे विकास अधिकारी मनुकुमार झा 'मनु' ने कहा– भारतेन्दु हरिश्चन्द की रचनाशीलता सामाजिक यथार्थ और अन्तर्विरोध की सच्ची परख और परिवर्तन की प्रेरणा के रूप मे आज भी प्रासंगिक है।
श्रीमती चम्पाबेन बालचन्द शाह महिला महाविद्यालय, सांगली, महाराष्ट्र के प्राचार्य प्रो० प्रकाश चिकुर्डेकर ने बताया– भारतेन्दु की शिल्प-सजगता मे व्यंग्य की तीक्ष्णता, करुणा की गहराई और राष्ट्रभावना का प्रभाव ऐसा है, जो उन्हेँ हिन्दी-नवजागरण का समर्थ निर्माता सिद्ध करता है।
राजकीय बालिका इण्टर कॉलेज, जियामऊ, लखनऊ मे हिन्दी-प्रवक्ता डॉ० प्रतिभा मिश्र ने कहा– भारतेन्दु की रचनाशीलता मे नवीन चेतना, सामाजिक यथार्थ और राष्ट्रीय अस्मिता की स्पष्ट झलक मिलती है।
प्रयागराज से कवयित्री एवं स्वतन्त्र लेखिका चेतना सिंह ने कहा– उनकी रचनाओँ मे असमानता की पहचान, शोषण का विरोध और प्रगतिशील मूल्योँ का आग्रह स्पष्टत: झलकता है।
शाहजहाँपुर से स्वतन्त्र लेखिका आशा शुक्ल ने कहा– भारतेन्दु के साहित्य मे राष्ट्रीय चेतना, प्रगतिशील दृष्टि और सुधार की पुकार है।
बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय, धनबाद मे शोधार्थिनी श्वेता कुमारी ने बताया– भारतेन्दु ने तत्कालीन समाज को जाग्रत् करने के लिए अपने साहित्य को माध्यम बनाया था।