“न ख़ुदा ही मिला, न विसाले सनम!”

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मुझे ऐसा कोई भी व्यक्ति पसन्द नहीं है, जो कहता कुछ हो और करता कुछ हो। ऐसों से मैं दूरी बना लेता हूँ। अधिकतर ‘लिक्खाड़’ और ‘वाचाल’ लोग ‘महिला- स्वातन्त्र्य’ की बात करते हैं; परन्तु अपनी बहू-बेटियों को ‘सात दरवाज़ों’ के अन्दर ताले लगाकर रखते हैं और दूसरे की बहू-बेटियों को बहुविध स्पर्श कर, ‘नारी-विमर्श’ की शिक्षा-दीक्षा करते हैं; उन्हें कविता, कहानी-लेखनकला का ज्ञान कराते हैं; पत्नी की उपेक्षा कर, एक अदद ‘परकटियों’ को पालकर रखते हैं। ऐसी परम्परा अति प्राचीन से चली आ रही है; इधर परवान चढ़ रही है।

कवि-सम्मेलनों और मुशायरों की शोभा बढ़ाने में दक्ष लोग कविता के साथ ‘कामिनी’ को भी लेकर चला करते हैं, जो मंचों पर प्राय: ‘दामिनी’ के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करती हैं। ऐसा लगता है, मानो कोई ‘अवतारी शक्ति’ ‘पाकिस्तान’ और ‘चीन’ को पलक झपकते ध्वस्त करने के लिए प्रस्तुत हो चुकी है।

मंचों पर तो अवतारी शक्ति’ के रूप में नेत्रलाभ कराती हैं और नेपथ्य में सुर-सुरा-सुन्दरी’ के उपासकों के साथ ‘रतिक्रीड़ा’ में निमग्न मोहिनी के रूप में। सच पूछिए तो अब नैतिकता के यही माप और मानदण्ड बन चुके हैं।

इस दौड़ में देश के कई जाने-माने प्रकाशक भी शामिल हैं, जो ऐसी ही गुणवती महिलाओं के समीप आने के लिए उनकी अर्थहीन कविता, कहानी, उपन्यास की पुस्तकें प्राथमिकता के साथ प्रकाशित करते आ रहे हैं। इतना ही नहीं, कुछ प्रकाशक तो ऐसे हैं, जो उन कथित सुन्दरियों के इशारे पर नाचते भी रहते हैं। उन्हें व्यापार के नाम पर ‘बाहर’ लेकर भी जाते हैं। इस तरह से दोनों एक-दूसरे का भोग करते रहते हैं; क्योंकि प्रकाशनजगत् का यह भी एक प्रकार का समझौता है– एक हाथ से लो-दूजे हाथ से दो।

एक शब्द लाया गया, ‘गॉड फादर’, जिसकी आड़ में, विभिन्न क्षेत्रों में ‘नवोदित महिला’ प्रतिभाओं को ‘परिपक्वता’ का पाठ पढ़ाया जाता रहा है। वे ‘नवोदित प्रतिभाएँ’ अवयस्क-अवस्था में भी ‘अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा’ को ‘नखशिख’ जीने का अभ्यास करने लगती हैं; किसी भी क़ीमत पर ऐसी महिलाएँ शिखर पर पहुँचने के लिए अपना ‘सर्वस्व’ भी दाँव पर लगा देने से परहेज नहीं करतीं। उनके प्रेरक होते हैं, अपने जीवन के उत्तरार्द्ध की ओर सरक रहे वे ‘गण्यमान्य’ (‘गणमान्य’, ‘गण्यमान’ अशुद्ध शब्दप्रयोग हैं।) लोग, जिनके पास तरह-तरह के साधन होते हैं; पहुँच होती है तथा पद-प्रतिष्ठा भी। इस तरह ‘व्यभिचार’ की सीढ़ी का एकसाथ दोनों ‘इस्तेमाल’ करते हैं। ‘नवोदिता’ को शीघ्रता रहती है, ‘मंज़िल’ तक पहुँचने की और ‘गॉड फादर’ के मन में हर पल यही पकता रहता है— इतनी जल्दी क्या है जानम! मंज़िल को पा जाने की?

‘गॉड फादर’ इस बात से भी वाक़िफ़ रहता है कि नवोदिता को यदि मंज़िल मिल गयी तो वह ‘फुर्र’ हो जायेगी, इसलिए वह ऐसी परिस्थिति तैयार कर देता है कि वह नवोदिता वयस्क होने के बाद भी वहाँ से निकल आने की कोई सफल युक्ति नहीं ढूँढ़ पाती। यही कारण है कि उसकी युवावस्था भी ढलने लगती है; परन्तु ‘गॉड फादर’ की ‘जोंक’-जैसी प्रवृत्ति उस पर प्रभावी रहती है। आगे चलकर, क़ानूनी मान्यता ‘लिव इन रीलेशन’-जैसी दिखने लगती है, जिसकी परिणति कालान्तर में, इतनी भयावह हो जाती है कि उस घर की हर दीवार पर स्याह शब्दों में अंकित दिख जाता है, “न ख़ुदा ही मिला, न विसाले सनम।”

सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ अगस्त, २०२० ईसवी।)