‘आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’

आइए! शब्द-मन्थन कर, शब्द-सामर्थ्य अर्जित करें।

★ शब्द है— ‘आयाम’।

प्राय: हमारे अधिकतर अध्यापक, विद्वज्जन, साहित्यकार, समीक्षक, मीडियाकर्मी आदिक ‘आयाम’ का अनुपयुक्त प्रयोग करते-कराते आ रहे हैं— चाहे वह वाचिक हो अथवा लिखित हो; फलत:, अधिकतर शिक्षक और विद्यार्थी, विशेषत: शोधविद्यार्थी उनके अनुयायी बन जाते हैं। ऐसे में, विद्यार्थियों का क्या दोष?

पुस्तक-लेखकों में से बड़ी संख्या (‘बहुत संंख्या’ का प्रयोग अशुद्ध है।) में ऐसे लोग हैं, जिन्हें सार्थक-निरर्थक से कोई प्रयोजन नहीं; पुस्तकें छपती रहें; लोकार्पण होता रहे; भीड़ पीठ थपथपाती रहे तथा जुगाड़ करके पुरस्कार -सम्मान बटोरते रहें। ऐसे में, पाठकों-श्रोताओं के ग्रहणशीलता और ज्ञान पर प्रश्नचिह्न भला क्यों?

हाँ, ऐसे में, सहज ही कतिपय प्रश्न स्वभावत: उठ खड़े होते हैं :—
‘आयाम’ का शाब्दिक अर्थ क्या है? वस्तुत: ‘आयाम’ क्या है? आयाम की अवधारणा क्या है? क्या ‘नये और पुराने आयाम’ का प्रयोग तर्क और तथ्यसंगत है— यदि ‘हाँ’ तो क्यों और यदि ‘नहीं’ तो क्यों?

यहाँ पर इन्हीं प्रश्नात्मक वाक्यों को सकारात्मक वाक्य-रचना में ढालने के उद्देश्य से एक बौद्धिक परिसंवाद आयोजित है। आप अपने अनुचिन्तन को सिद्ध कर सकते हैं।

तो आइए! हम-आप अपनी शब्द-साधना का परीक्षण करें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ जून, २०२० ईसवी)