निर्भया (रागिनी) सामूहिक बलात्कार और हत्या-प्रकरण के दुर्दान्त अपराधियों को ‘मृत्युदण्ड’ कब?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


भारत की न्याय-पद्धति और न्याय-प्रक्रिया कितनी शिथिल है, इसका प्रमाण प्रस्तुत करता है, ‘निर्भया सामूहिक बलात्कार और जघन्य हत्या-प्रकरण’।

पाँच वर्षों से भी अधिक की अवधि व्यतीत हो चुकी है; परन्तु देश के शीर्षस्थ न्यायतन्त्र उच्चतम न्यायालय की ओर से बलात्कार और हत्या के अपराधियों को ‘मृत्युदण्ड’ देने के निर्णय के बावजूद सारी न्यायिक प्रक्रियाओं पर पूर्ण विराम लग चुका है और देश की एक अरब पैंतीस करोड़ जनता की ओर से प्रश्नचिह्न भी। यदि ऐसा नहीं तो जिस प्रकरण के विरोध में देश की जनता उद्वेलित होकर, अपने घरों से निकलकर अपराधियों को त्वरित निर्णय के द्वारा ‘मृत्युदण्ड’ की माँग की थी, उसकी मार्मिक भावनाओं और संवेदना को आहत करते हुए, आज, हमारी न्यायपालिका की न्यायपद्धति उपहास कर रही है, जो निस्सन्देह, नितान्त शोचनीय है। इससे अब अपरिहार्य हो गया है कि ‘भारतीय दण्ड संहिता’ में वांछित-अपेक्षित परिवर्त्तन कर, न्यायिक प्रक्रियाओं की जटिलताएँ समाप्त की जायें, अन्यथा न्यायिक दुरवस्था इतनी संश्लिष्ट हो जायेगी कि दुर्धर्ष अपराधी सीना और ताल ठोंककर आपराधिक कृत्य करते रहेंगे और हमारी न्यायपालिका ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी’ बनी रहेगी। इस प्रकरण से थोड़ा अलग हटकर न्यायपालिका की कार्यपद्धति पर मैं एक अन्य प्रश्न उठाता हूँ :—

न्यायालय वर्षों से देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से प्रश्न करती आ रही है— ‘गंगा की स्वच्छता’ के लिए आपने कौन-कौन-से कार्य किये हैं? गंगा कितनी स्वच्छ हुई है? उस स्वच्छता-अभियान में कितने रुपये व्यय हुए हैं; मगर नरेन्द्र मोदी मौन साधे हुए हैं।

 

दूसरा प्रकरण है, उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी से सम्बन्धित। पहला प्रकरण, गोरखपुर में बाबा राघो चिकित्सालय में हज़ारों बच्चों की मृत्यु-रहस्य का है। एक अन्य प्रकरण है, उत्तरप्रदेश में ‘अपराधियों के साथ पुलिस-मुठभेड़’ का, जिनमें से अधिकतर ‘छद्म मुठभेड़’ के रूप में प्रकाश में आये हैं। न्यायालय उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री को सप्रमाण स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के लिए आदेशित कर रहा है; परन्तु मुख्य मन्त्री न्यायालय की अवमानना करते आ रहे हैं।

अब मूल प्रश्न है, यहाँ न्यायपालिका मौन क्यों है? यदि कोई सामान्य व्यक्ति ने वैसा किया रहता तो न्यायपालिका की तेज़ी देखती ही बनती। अत: इन सारे सन्दर्भों में देश की न्यायपालिका की न्याय-प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्त्तन करने की आवश्यकता है। इसके लिए देश के शीर्ष क्रम के विधिज्ञमण्डल का गठन कर, अराजनीतिक रूप में इस विषय पर बृहद् मन्थन किया जाना और ‘नवनीत’ लाया जाना अब अपेक्षित हो चुका है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १० जुलाई, २०१८ ईसवी)