डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का औचित्यविहीन गीत गानेवालो! हमारी उन बेटियों को पढ़ाने में तुमने कितने रुपये की सहायता की है, जो ढंग से दो वक़्त का भोजन तक करने में पूर्णतः समर्थ नहीं हो पा रही हैं? उनके घरों में जाकर कभी ‘बेटी-दर्द’ को समझने का प्रयास करते हो?
तुम लोग भी जानते हो, बेटियाँ हवा में नहीं पढ़ायी जातीं। जन्म से पूर्व और जन्म के पश्चात् तक बेटियों के ‘गुप-चुप दारुण आँसुओं’ और ‘चीत्कार करते सार्वजनिक आँसुओं’ की पृष्ठभूमि को कभी समझने का प्रयास तुम लोग ने किया है? बेटियों के स्वास्थ्य, पोषण, सेवा तथा नियोजन के लिए तुमसब ने कौन-सी अतिरिक्त व्यवस्था की है? एक बेटी को पालन-पोषण करने से लेकर संदूषित सामाजिक मनोवृत्ति और विकृति से बचाकर, संरक्षित-सुरक्षित करते हुए, माँ-बाप और अभिभावकगण को क्या-कुछ नहीं झेलना पड़ता है; समाज की पतित दृष्टि हमारी बेटियों को यह अनुभव कराने लगती है कि छायावादी कृती कृतिकार जयशंकर प्रसाद की यह प्रसिद्ध काव्यपंक्ति “नारी! तुम तो श्रद्धा है” मात्र एक आदर्शात्मक उपदेश है; यथार्थ का तो पुट है ही नहीं है। आदर्श की अभिव्यंजना प्राय: थोथी मर्यादा की रक्षा के लिए की जाती है।
किसी भी चिन्तन और विश्लेषण का आधार समग्र में होता है, तभी सम्यक् निष्कर्ष और निष्पत्ति से साक्षात् होता है।
उक्त नारे को विषैले सर्प के रूप में देश की प्रत्येक अजन्मी-जन्मी बेटियों के गले में इस तरह से लपेट दिया गया है, मानो ‘अवसरवादी’ सर्प डँसने के लिए घात लगाये हों, जो आये-दिन अपना मर्मांन्तक दंश-प्रभाव से हमारी बेटियों को न मरने दे रहे हैं और न जीने।
उक्त प्रकार के स्वार्थपरक नारा लगाने वालों से आज प्रत्येक माँ-बाप का प्रश्न है— हमारी सारी शक्ति और पूँजी बेटियों को बचाने और पढ़ाने में समाप्त होती जा रही है; बेटियों के लिए कहीं-कोई ठोस और विश्वसनीय आर्थिक आधार नहीं दिख रहा है, क्यों? हमारी बेटियाँ सन्ध्या-समय ७ बजे अपने घर में हमलोग की आँखों के सामने नहीं होती हैं तब हम अज्ञात भय से आक्रान्त होकर उन्हें अपने ‘पास’ होने के लिए व्यग्र हो जाते हैं। ऐसे में, नाराबाज़ो! हमारी बेटियों की सुरक्षा के लिए तुमने कौन-सी ऐसी ठोस नीति बनायी है, जिसके कारण हम माँ-बाप और अभिभावकगण मुक्त होकर अपना सुखद पारिवारिक जीवन-यापन कर सकें।
पिछले चार वर्षों से तुम लोग लोकतन्त्र के सीने पर अपनी नाकामी के मूँग दलते नज़र आ रहे हो। तुम लोग ने हम माँ-बाप को ऐसी कौनसी सुविधा दी है? कोई भी एक सुविधा बताओ, जो हमारी बेटियों को पढ़ाने के लिए दी हो? उन सरकारी पाठशालाओं की बात बिलकुल मत करना, जहाँ अयोग्यता का बोलबाला है और जो विवशता का परिचायक है। हमारे रुपयों पर ‘मिड-डे-मिल’ की योजना क्रियान्वित करनेवाले ऐश करते आ रहे हैं और हमारी बेटियों को भोजन के नाम पर ‘विषाक्त’ भोजन देते आ रहे हैं; उनमें छिपकलियों को मिलाया जाता है। ऐसे प्रकरण आयेदिन प्रकाश में आ रहे हैं; परन्तु तुम लोग निश्शब्द बने रहते हो; अन्तत:, क्यों?
प्रवेश कराने से लेकर पुस्तक, स्टेशनरी, गणवेशादिक ख़रीदने, कोचिंग-संस्थानों में पढ़ाने, फॉर्म भरवाने, भ्रष्टाचारियों के मुँह भरने आदिक में हमारे लाखों रुपये व्यय हो जाते हैं। ऊपर से उनपर तरह-तरह के औचित्यरहित तुम्हारे ‘सरकारी कर’ मध्यम और निम्न-वर्गों के माँ-बाप की कमर तोड़ते आ रहे हैं।
तुम सब ‘सत्ता की खोखली राजनीति’ करने में लगे हो और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के आधारहीन नारे तो लगाते हो; परन्तु जब हमारी चार, सात, आठ, नौ वर्ष की बेटियों का अपहरण कर लिया जाता है; बेटियों के साथ ‘सामूहिक बलात्कार’ किया जाता है तथा उनकी नृशंस हत्या कर दी जाती है तब मौन रह जाते हो।
इसे देश की जनता प्रतिदिन देखती है और तुम सबको धिक्कारने के लिए नये शब्दों की खोज करती है। उनमें से अधिकतर ऐसे प्रकरण होते हैं, जिनमें ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के नारा लगानेवाले ही प्रत्यक्ष रूप में संलग्न दिखते हैं। अपने राजनीतिक दल की बदनामी और स्वयं के चेहरे पर कालिख़ पुतने के डर से तुम लोग पुलिस-प्रशासन और न्यायिक संस्थाओं की सम्बन्धित जाँच की दिशा को प्रभावित करते हो। तुम सबने तो उन बेटियों का वर्गीकरण करके अपनी बेहद घटिया मंशा ज़ाहिर कर दी है। तुम लोग को वे बेटियाँ ‘अपनी बेटियों’ के रूप में नहीं दिखतीं; तुम्हें तो ‘हिन्दू बेटी’, ‘मुसलमान बेटी’, सिक्ख बेटी, ईसाई बेटी, ‘दलित बेटी’, ‘प्रवासी बेटी’ के रूप में ‘हमारी बेटियाँ’ दिखती हैं। ऐसा इसलिए कि तुम सबकी संवेदना ‘उधार’ और ‘किराये’ की होती है; आस्था, विश्वास तथा श्रद्धा की नहीं।
समय बहुत बलवान है। हो सकता है, बेटी का दर्द तुम्हें भी अनुभव करने का अवसर दे दे और तुममें से पत्नीसहित होकर जो पत्नीरहित हैं; सन्तानरहित हैं, उन सभी को हम माँ-बाप की ‘हाय’ ऐसी लगे कि ‘तुम सब’ कहीं के न रहो।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ९ जुलाई, २०१८ ईसवी)