लखनऊ में बी०टी०सी० अभ्यर्थियों को पुलिस ने लाठियों से क्यों मारा?

 डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

कल (१५ फरवरी, २०१८ ई०) का दिन उत्तरप्रदेश-शासन के लिए बर्बरता का था; काला दिन था। उत्तरप्रदेश की दिव्यांग सरकार लगभग एक वर्ष से न्याय की माँग करनेवाले बी०टी०सी० के सफल अभ्यर्थियों की आवाज़ को दबाती आ रही है; सब्र की भी एक सीमा होती है। उच्च न्यायालय ने उत्तरप्रदेश-शासन को निर्देशित किया था कि १२,४६० सफल बी०टी०सी०-अभ्यर्थियों को नियुक्तिपत्र दिया जाये परन्तु अफ़सोस! उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ का मन्त्र जाप करते रहे; हिमाचलप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, बंगाल, त्रिपुरा आदिक राज्यों में ‘पोस्टर ब्वॉय’ बनते रहे और इधर, ये सारे अभ्यर्थी बेरोज़गारी के दंश को झेलते रहे। नवम्बर, २०१७ ई० में न्यायालय ने उत्तरप्रदेश-सरकार को स्पष्ट निर्देश किया था : सभी १२, ४६० सफल बी०टी०सी०-अभ्यर्थियों को नियुक्ति-पत्र दिया जाये किन्तु अपनी नियुक्ति से पूर्व में ही विवादित रही मन्त्री अनुपमा जायसवाल ने न्यायालय की अवमानना करते हुए, नियुक्ति-विषय को ‘समीक्षा’ की फाइल में डाल दिया है।
अब प्रश्न है : लखनऊ के हज़रतगंज के क्षेत्र में वे अभ्यर्थी अपनी माँग के लिए प्रदर्शन कर रहे थे तब उन महिला-पुरुष अभ्यर्थियों पर लाठी-चार्ज करा दिया गया और कुछ को गिरिफ़्तार कर लिया गया!..? महिला अभ्यर्थियों के बाल क्यों खींचे गये?
साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ के नाम पर ‘तिरंगा-यात्रा’, ‘हुंकार यात्रा’, ‘बाइक यात्रा’ राजनीतिक लोग निकाल सकते हैं परन्तु वे बेरोज़गार, जिनके अथक प्रयास से आदित्यनाथ योगी अतिरिक्त बहुमत के साथ सत्ता में आये हैं, वे अपने अधिकार के लिए ‘आक्रोश-यात्रा’ निकालते हैं तो उन्हें ‘अपराधी’ बना दिया जाता है। उनके प्रति ऐसी निर्ममता क्यों! क्या नरेन्द्र मोदी के ‘गुड गवर्नेंस’, ‘मेक इन इण्डिया’, ‘न्यू इण्डिया’ इत्यादिक का अवधारणा और निहितार्थ यही है?
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय ने वर्तमान उत्तरप्रदेश-सरकार को निर्देशित किया था : चार सप्ताह के भीतर मामले का निस्तारण किया जाये। अब लगभग ११ माह हो चुके हैं किन्तु उत्तरप्रदेश-शासन के कानों में जूँ तक नहीं रेंग रहा है। उन अभ्यर्थियों की अवस्था बढ़ती जा रही है; कितनों के विवाह हो चुके हैं; कई माँ और पिता बन चुके हैं; गृहस्थी के बोझ से दबे जा रहे हैं। ऐसे में, उनका आक्रोश यदि सार्वजनिक हुआ है तो दोषी वे नहीं है बल्कि अपने दायित्व को समझते हुए भी, न समझनेवाले मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी हैं।
आदित्यनाथ योगी और उनके मातहत यह न भूलें कि वह वही युवाशक्ति है, जिसने मायावती और अखिलेश यादव को सियासत के हाशिये पर धकेल दिया था तथा उत्तरप्रदेश से काँग्रेस को उखाड़ फेंका था।
वैसे वे अभ्यर्थी भी कम नहीं हैं, जो ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’, ‘राम-रहीम’ की झण्डाबरदारी करते आ रहे हैं। उन्हें इस यथार्थ को नहीं भूलना चाहिए कि पेट ख़ाली रहेगा तो न उन्हें हिन्दू रोटी देगा, न हिन्दुत्व पानी देगा; न राम हालचाल लेने आयेगा और न रहीम परवाह करेगा। वे स्वयं समर्थ रहेंगे; आत्मनिर्भर रहेंगे; सुविधा-सम्पन्न रहेंगे तो दुनिया साथ रहेगी, वरना अभावों में सभी ठेंगे पे मारते रहेंगे।
अब एकमात्र उपाय है, सभी १२,४६० अभ्यर्थी सामूहिक रूप में उच्च न्यायालय में ‘न्याय की अवमानना’ के लिए उत्तरप्रदेश-शासन पर मुक़द्दमा करें। ऐसे में, जब न्याय का हथौड़ा उस पर पड़ेगा तब बेहोशी टूटेगी। यही नहीं, अगले चुनाव में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना, वे सारे अभ्यर्थी न भूलें।