किसी से ‘अतिरिक्त’ अपेक्षा क्यों और किस हेतु?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

आज एक ‘अस्वस्थ’ मित्र का उपालम्भपूर्ण सम्प्रेषण पढ़ने के पश्चात् मेरा मन विषण्ण हो उठा। मैं स्वयं को रोक न सका। उनकी कातरता को ‘अपनी’ कातरता बनाते हुए, वास्तविक अनुभूति की तरलता और गहनता से उन्हें परिचित कराना आवश्यक समझा; क्योंकि समाज से अभिलाषा, आकांक्षा, आशादिक करने का औचित्य समझ में नहीं आता; जबकि सर्वज्ञात है कि सामाजिक संवेदना शुष्कप्राय है; समाज तो ‘स्व’ में केन्द्रित है; फिर समाज का गठन भी हमने ही किया है।

ऐसे में, मैंने उनके सम्प्रेषण पर अपनी दो टूक प्रतिक्रिया इन शब्दों में की है, जो सभी के लिए एक ‘मार्गदर्शिका’ सिद्ध हो सकती है :—
“दर्द को पीने का अभ्यास कीजिए; अपेक्षा किसी से ‘किस हेतु’? अपेक्षा की परिणति ‘उपेक्षा’ में होती है। आप एक अध्येता हैं; उसके बाद भी अतिरिक्त ‘मोह-माया’ से जुड़ाव!..?

प्रसंग खुल गया तो आपको सूचित कर दूँ, पिछले छ: दिनों से मैं तीव्र ज्वर से पीड़ित रहा हूँ और कायिक शिथिलता अलग से; परन्तु ‘दैन्य’ जैसा गर्हित भाव-विचार से नितान्त पृथक् हूँ। वही वैचारिक उष्मा, वही आन्तरिक ऊर्जा तथा वही जिजीविषा और जिगीषा के साथ ताल ठोंक कर अपनी शैली में स्वयं को जीता हूँ। दृष्टिकोण बदलिए और जीवनशैली भी।”