कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

पूरे 9 साल बाद “आप” यहाँ और वो कहाँ ..?

पूरा आर्टिकल अवश्य पढ़ें…

ज्ञान के बिना धर्म अंधा है।
कर्म के बिना लूला-लँगड़ा तथा भक्ति के बिना निष्प्राण होता है।
वही व्यक्ति पूर्णतया धार्मिक है जिसके जीवन मे इन तीनों का ही समग्र विकास होता है।
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महाराजा अज के यहाँ यज्ञायोजन था।
एक दिन महर्षि वशिष्ठ जब प्रधान पुरोहित का कार्यभार संभालने जा रहे थे तो मार्ग में उन्हें मंडी नामक व्यक्ति मिला।
व्यथित हृदय से वह अपना दुखड़ा रोने लगा-

“देव, मैंने श्रमशीलता में कोई कसर शेष नही रखी।
मैंने सदा अच्छा आचरण किया है।
अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया है।
फिर भी मैं अपने में अपूर्णता पाता हूँ। मेरा हृदय सूना-सूना है।”
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मुनिवर बोले- “तात! तुमने कर्म और ज्ञान की उपासना तो की है, किन्तु भावपक्ष की उपेक्षा की है। यह उसी का परिणाम है कि तुम ऊने तथा सूने हो।
अब तुम स्नेह बाँटो।
बदले में दस गुना पाओगे।
सब जीवधारियों में अपने आत्मा के दर्शन करो।
इससे तुम्हारा जीवन व्यापक होगा।
तुम्हे आनंद मिलेगा, संतोष प्राप्त होगा।”
शीतल वचन सुनकर मंडी को दिशा मिली।
वह अर्जित ज्ञान, धन, स्नेह बाँटने लगा और उसकी अपूर्णता समाप्त हो गयी।
वह सच्चा धार्मिक हो गया।

  • (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, पुस्तिका : आत्मवत् सर्वभूतेषु, खण्ड-2)
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    समीक्षा-:
    जीवन चार आयामी है।
    क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, भावशक्ति और चिद्शक्ति- इन चारों के सामंजस्य से ही जीवन चलता है।
    इनमें से किसी एक की भी उपेक्षा मनुष्य को अपूर्ण बना देती है।

कर्म के बिना ज्ञान का विकास नही होता।
ज्ञान के बिना भाव का विकास नही होता।
भावनावों के बिना आत्मचेतना का विकास नही होता।

आत्मा सर्वव्यापक है।
भावना हमें सबसे जोड़ती है।
ज्ञान हमें जुड़ने के लिए प्रेरित करता है।
कर्म हमें अनुभवी बनाता है, ज्ञानी बनाता है।
मूल बात यही है कि जब तक हम अपने सर्वात्मक स्वरूप को प्राप्त या विकसित नही कर लेते तबतक हमें पूर्ण सुख, शांति, तृप्ति, तुष्टि प्राप्त नही होती।
अहंकार और स्वार्थ हमें खिन्न बनाये रहते हैं।
अतः पारस्परिक द्वंदबुद्धि परित्याज्य है।

इसे और सरल भाषा मे समझने हेतु निम्नलिखित आर्टिकल अवश्य पढ़ें व समझें…
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मानवजीवनविकास भूमिका
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मानव जीवन एक विकास यात्रा है। 

सृष्टि के विकासक्रम की भांति मानवजीवन भी चार आयामी है। 

तन, मन, प्राण, आत्मा ही इसके चार आयाम है।

क्रिया, विचार, भाव, चेतना ही इन चारों आयामों की गतियां हैं।

बल, वाणी, व्रत, विवेक ही इन चारों आयामों के प्रतिफल हैं।

शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, चेतनात्मक विकास के उपायों द्वारा इन चारों आयामों की क्षमताओं का विकास किया जा सकता है।

मानवीय क्षमताओं के विकास की संभावना प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान रहती है।

आवश्यकतानुसार कोई भी मनुष्य अपनी इन क्षमताओं का विकास कर सकता है।

विकसित क्षमताओं के अनुसार ही मनुष्यों की वरीयता एवं पात्रता सिद्ध होती है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। 
सामाजिक सभ्यता में चार प्रकार के कर्मो का समावेश होता है।

इन चारों कर्मो के नाम हैं-
कृषि, वाणिज्य, राज्य, नेतृत्व।

इन चारों कर्मो पर ही सामाजिक संरचना खड़ी होती है।

इन चारों कर्मो को सम्पादित करने के लिये ही चार मानवीय क्षमताओं की आवश्यकता होती है।

क्रियाशक्ति से कृषिकर्म,
वाकशक्ति से वणिज्यकर्म,
व्रतशक्ति से राज्यकर्म एवं विवेकशक्ति से नेतृत्वकर्म सम्पादित होता है।

इन चारों शक्तियों को ही
शारीरिक क्षमता Physical Quotient (PQ),
मानसिक क्षमता Intellectual Quotient (IQ),
भावनात्मक क्षमता  Emotional Quotient (EQ)
एवं चेतनात्मक क्षमता Spiritual Quotient (SQ) के नाम से जाना जाता है।

क्षमतानुसार पात्रता, पात्रतानुसार कर्म, कर्मानुसार पद, पदानुसार सम्पदा की न्यायसंगत व्यवस्था को ही मानवीय सामाजिक सभ्यता के नाम से जाना जाता है।

पिछले 9 वर्षों में दिल्ली में आज ही के दिन 26th नवम्बर 2012 को आदरणीय अरविंद केजरीवाल जी ने आमआदमीपार्टी की स्थापना करके सम्पूर्ण मानवजीवन के सम्पूर्ण विकास हेतु मानवीय चारों क्षमताओं को विकसित करने हेतु ही शिक्षा से जुड़े समुचित अवसर व संसाधनों को सुव्यवस्थित किया और आज पूरे 9 साल बाद सम्पूर्ण विश्व मे दिल्ली राज्य का शिक्षा व अन्य मानवीय विकास का मॉडल चरितार्थ हो रहा है।

आज यह कहते हुए अतिसयोक्ति नही होगी कि वह दूर नही जब सम्पूर्ण विश्व आमआदमीपार्टी की इस विकासयात्रा को सहर्ष स्वीकारेगा और मानवजीवन के विकास में सहायक भी होगा।

आप भी अपना यथा सम्भव सहयोग देने हेतु आमआदमीपार्टी से अवश्य जुड़े व अपने सज्जन मित्रों को भी जोड़े।
!!शुभकामना!!


राम गुप्ता (स्वतंत्र पत्रकार)
अति साधारण कार्यकर्ता/प्रचारक
आम आदमी पार्टी, उत्तरप्रदेश