(‘परियागराज’ मात्र एक प्रतीक है। ऐसी मानसिकता के लोग सर्वत्र हैं।)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

सबद चीनी मात करै, जहर हिरदय मा लाय।
ऐसो जन घर-घर दिखैं, मन नाहीं पतियाय।।
महादेबी से बढ़ि लखैं, रचना दिखै लरिकाय।
कहैं ‘कबित्री’ आपहूँ, मन आपनु जरि जाय।।
थोबड़ा जस धूरत दिखै, आँखि जेहर फिरि जाइ।
चोर-चोर मौसेरन भाई, नाहिं दिखै हय उपाइ।।
ढेरन साहितकार दिखैं, काम न कवनो काज।
छुप छुरा पीठ मा घोपैं, इ हय परियागराज।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ जून, २०१९ ई०)