प्रेरणा नम्रतामयी होती है । मूढ़मतियों को जागरण के सोपानों पर चढ़ने की उपादेशना है । यह ऐषणाओं को दृष्टाभाव नहीं कर्ताभाव की ओर लक्षित करती है। प्रेरणा अवकाशभोगी दार्शनिक नहीं, पार्थिव काया-माया की जटिल जालिकाओं के भ्रमित भाव में अटकती, भटकती, लटकती, दुविधा की नयी विधाओं की एक पल झलक देती है, तस्तु चिन्ताहारिणी भासती है ।
अरे मूरख- अन्तःप्रेरणा न जागी तो प्रेरणा लाख प्रयासों के बाद भी कर्तव्यपथ पर बलपूर्वक भी नहीं ले जा सकेगी। उठो, जागो, अपने ज्ञान को कर्म में बदलो। बिना लक्ष्य का ज्ञान किस काज का । देख झूठे प्रदर्शनों से तू अब बच न सकेगा । वैसे भी प्रदर्शन को दर्शन की आवश्यकता थी ही कब ?
हे डॉक्टर राधाकृष्णन, जो आज तुम मेरे जैसे पद वाले
शिक्षक होते, तो तुम्हारा ज्ञान तुम्हें बारम्बार कोसता, क्योंकि तुम्हारे शिक्षकगण कुटिल प्रत्याशा वाले शक्तिमानों के सम्मुख विवश होते जा रहे हैं। कर्तव्यों के नित प्रति बढ़ते बोझ, अति धृष्टता भरे आदेश निर्देशों से यदि तुम आवृत होते तो अलमस्त मनोरोगी बनकर भटकते ।
हाय क्या कहूँ, तुम्हारे अधिकांश शिक्षक ‘ऐप’ रोगी हो गये हैं । आपकी तरह वे ‘बुक राइटर, रीडर नहीं’ फेसबुक रीडर, राइटर हो चले हैं । कर्मणा- धर्मणा असुमेलित हो रहे हैं। प्रवंचना के प्रस्तर श्लाघ्य नहीं हो पा रहे हैं । और उनके अधिकारी बन बैठे, लोग अपने कुद्रूप आदेशों से गुरु की देश- शील मर्यादा को निर्लज्जता के साथ नग्न-भग्न कर
रहे हैं ।
अवधेश कुमार शुक्ला
मूरख हिरदै
डॉक्टर राधाकृष्ण जयन्ती
भाद्रपद शुक्ल सप्तमी
०५ सितम्बर २०१९