डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
देश की जनता को ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ और ‘मुसलमान-मुसलमानत्व’ का खेल मत दिखाइए; पहले स्वयं एक ‘मनुष्य’ बनिए, फिर अपने-अपने तरीक़े से भारत राष्ट्र को सुधारने का दावा कीजिए। यदि राष्ट्रहित में कुछ करने की चाह हो तो जन-जन के मन-प्राणों में ‘राष्ट्रीयता’ का बीज-वपन कीजिए ताकि वह अंकुरण का श्रेय प्राप्त कर, ‘भारतीयता’ के महावृक्ष के रूप में अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके और उसकी शाखाएँ लहरा-लहराकर साम्प्रदायिक सद्भाव-सन्देश का संचार करती लक्षित हों, “हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा।”
भारत को ‘भारत’ ही रहने दीजिए; उसे न ‘इण्डिया’ चाहिए और न ही ‘न्यू इण्डिया’ के नाम पर उसके साथ छल कीजिए।
आज देश की स्थिति नितान्त विषम है। सम्प्रदायवाद को नकारात्मक दिशा देने के लिए तरह-तरह के अफ़ीमची गली-कूँचे घूम रहे हैं : कुछ हिन्दुत्व की अफ़ीम’ बाँट रहे हैं तो कुछ मुसलमानत्व की, जबकि वे स्वयं ‘हिन्दुत्व और मुसलमानत्व की मूल भावना से अनभिज्ञ हैं। ऐसे लोग अपने जीने-खाने और भारत राष्ट्र पर शासन करने के लिए ऐसे गर्हित आचरण का परिचय देते आ रहे हैं।
टिटिहरी अपने पाँवों को जब ऊपर की ओर फैलाती है तब विचार करती है : मैंने अपने दोनों पाँवों को ऊपर फैला लिया है, जिससे यदि आकाश धरती पर गिरेगा तो उसे मैं अपने पैरों से रोक लूँगी।