‘विश्व कविता दिवस’ विशेष – कविता

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद)


मन में  उठते   भाव   कभी,
जब कागज़ में उगने लगते हैं।

शिक्षित और  अशिक्षित   सब,
उसको कविता कहने लगते हैं।

जब  क़दम  बढ़ाती  है कविता,
तब  शेर   निकलने   लगते  हैं।

करती  है  शब्दों  से  शंखनाद,
सत्ता सिंहासन हिलने लगते हैं।

कभी  लिखें इतिहास चिरन्तन,
कभी  लिखें   परतन्त्र  व्यथा।

कभी   लिखेंगे   गुजरे   लम्हें,
तो  कभी  लिखेंगे आत्मकथा।

देशकाल परिभाषित करने की,
क्षमता      जिसने   पाई    है।

वही क़लम अब दुनियाँ में यारों,
लगती     बहुत     पराई     है।

जिस    धरती      ने      उपजे ,
दिनकर   और     निराला  थे।

जिस    धरती  ने पिए निरन्तर,
विष के  अगणित  प्याला  थे।

आज   वही     धिक्कार   रही,
इन आत्मप्रवंचित कलमों को।

श्रृंगार   दिखाने की     चाहत के,
अधनंगे    से      बलमों     को।

काव्य   की  तभी   सार्थकता है,
जब   देश    जागरित कर जाये।

क़लम की स्वर्णिम सियाही क्या?
जो    आँख   देखकर  डर जाये ।