आकांक्षा मिश्रा (बस्ती)-
सब गलियाँ सुनसान हैं
खनकती आवाजें भी ख़ामोश हैं
बचपन कमरों में कैद हुआ
स्वयं के जीवन का बोध करता हुआ
अपनी माँ के प्रेम से दूर हैं
गलियों में अंधेरा घना जीवन को भेदता हुआ
न जाने क्यों ?
खुद को पोषित करता हुआ बेकरार है
ये उल्लास की आशाएं धूमिल सी
जिंदगी के सफर में तिनका बन रही
तुम जो कह दो
हंसी कभी धूमिल नहीं होती
लौटती है नई खनक के साथ ।