डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
मनसा-वाचा-कर्मणा परिशुद्ध मनुष्य को कोई पसन्द नहीं करता, क्योंकि वह प्रत्येक सत्य को ‘सत्य’ के साथ विकाररहित होकर कहता है; उसके कथन और कर्म में कोई भेद नहीं रह जाता। लक्ष्य-संधान करते समय उसे कण्टकाकीर्ण पथ को प्रशस्त कर, अग्रसर की भूमिका में रहना पड़ता है। कोई अदृश्य शक्ति उसकी धैर्य की परीक्षा करती रहती है। ऐसे में, मनुष्य को सन्तुलित होकर अपने कर्म के प्रति सन्नद्ध होना चाहिए। अंततः, विजय उसी की होती है। जीवन के कर्म-क्षेत्र का ‘महारथी’ वही होता है। मृत्यूपरान्त भी उसका वही सत्य उसके साथ रहता है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २१ मई, २०१८ ई०)