नरेन्द्र मोदी के लिए शराब ‘बुराई’ है और ‘कमाई’ भी!..?

 डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

वाह, नरेन्द्र मोदी वाह! कमाल कर दिया!वक्ता हो तो नरेन्द्र मोदी-जैसा। हमारे युवा-वर्ग को मोदी ने ही आश्वासन दिया था– ‘मेरी सरकार’ आयेगी तो प्रतिवर्ष दो करोड़ युवाओं को रोज़गार देगी। अब जब उन्हें नौकरियाँ नहीं मिलीं तब ग़म ग़लत करने के लिए वे ‘शराब’ का सहारा ले रहे हैं तो इसमें मोदी को ‘शिकायत’ अथवा ‘दिशा-निर्देश’ करने का अधिकार कैसे मिल गया है?

नरेन्द्र मोदी की ‘मेरी सरकार’ का गठन होने के बाद से, अब चार वर्षों से अधिक की अवधि व्यतीत हो चुकी है; इस अवधि में उन्होंने उन युवाओं के भविष्य को समृद्ध बनाने के उद्देश्य से कौन-सी ऐसी कारगर नीति बनायी है, जिनके भविष्य शराब पीने से बरबाद हो रहा है? युवापीढ़ी को कोई तो योजना बतायी जाये, जिसका क्रियान्वयन-पक्ष प्रत्यक्ष हो रहा है।

घोर आश्चर्य है! ‘भारतीय जनता पार्टी के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी’ पहली ओर, मायूस मुद्रा में नौटंकी करते हुए, युवापीढ़ी में शराब पीने की बढ़ती समस्या के प्रति चिन्तित दिखते हैं; जबकि दूसरी ओर, उसी युवापीढ़ी-द्वारा शराब ख़रीदने से प्राप्त आय को वे धीरे से सरकारी ख़ज़ाने की ओर सरका देते हैं। है न दोहरा चरित्र? दूसरे शब्दों में— यह कथन चरितार्थ होता है :– हाथी के खाने के दाँत और, दिखाने के और।

नरेन्द्र मोदी को युवापीढ़ी के भविष्य की इतनी ही चिन्ता रहती तो जो ‘टी०ई०टी०-बी०एड्०’ के अर्हता और अभियोग्यता-प्राप्त विद्यार्थी उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में न्यायालय-द्वारा नियुक्त करने के आदेशपत्र को लेकर महीनों से संघर्ष कर रहे हैं; पुलिसकर्मियों की बर्बरता के शिकार हो रहे हैं, उनके पास पहुँच कर अपनी सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए, उन्हें नियोजित कराते।
योग्यता को दर किनार करते हुए, युवापीढ़ी-विरोधी ‘आरक्षण और प्रतिआरक्षण’ को प्रश्रय देते हुए, युवापीढ़ी को शराब पीने के लिए कौन बाध्य और विवश कर रहा है? अपने बच्चों को पढ़ाते-लिखाते माँ-बाप बूढ़े होते जा रहे हैं और उनके बच्चे सरकारी नौकरियों से वंचित रखे जा रहे हैं और निहायत अयोग्य नौकरियाँ पा जा रहे हैं। क्यों होता है, ऐसा? इसे समझने की फ़ुर्सत नरेन्द्र मोदी को कहाँ है? ख़ुद को ‘ग़रीब’ और ‘नीच जाति’ से सम्बोधित कर, जनता को मूर्ख बनानेवाले नरेन्द्र मोदी को वास्तव में, अपनी ग़रीबी का एहसास होता तो देश की जनता के रुपयों पर ‘ऐश’ नहीं करते; बल्कि उन्हीं रुपयों को शराब पीकर बरबाद हो रही युवापीढ़ी के भविष्य को बनाने और सँवारने में लगाये होते। तब कहीं सरकारी कुनीतियों के कारण नष्ट हो रही हमारी युवापीढ़ी ‘आज’ प्रगति-पथ पर होती।

सच तो यह है कि नरेन्द्र मोदी को ‘शराब’ प्रिय है, न कि शराब पीनेवाली ‘युवापीढ़ी का भविष्य’।

वास्तव में, देश की युवापीढ़ी के शराब पीने से समाज के तबाह हो जाने का भय नरेन्द्र मोदी को यदि है तो ‘कल से’ समस्त समाचार-चैनलों के माध्यम से सम्पूर्ण देश में जिस अन्दाज़ में तथाकथित ‘नोटबन्दी’ की घोषणा की थी, उसी अन्दाज़ में शराबबन्दी’ की घोषणा कर दें; क्योंकि ऐसा करना उनके अधिकार-क्षेत्र में है। क्या देशी और क्या विदेशी शराब, उनसे सम्बन्धित सभी दूकानों को ‘सीज’ करा दें तथा विदेशों से शराब के आयात को अवैध घोषित करा दें और देश की सभी शराब-भट्ठियों की ‘अनुज्ञप्ति’ (लाइसेंस अनुमतिपत्र) सदैव के लिए निरस्त करा दें। शराब पीकर नरेन्द्र मोदी का ख़ज़ाना भरनेवाली, बरबाद होती जिस युवापीढ़ी के माता-पिता उन्हें (नरेन्द्र मोदी को) ‘बद्दुआ’ दे रहे हैं, उन्हें ‘दुआ’ देंगे। क्या वे ऐसा सुकृत्य कर-करा सकते हैं? यदि नहीं तो नरेन्द्र मोदी को उपदेश और ज़ुम्लेबाज़ी करने तथा व्यर्थ में समाज के स्वास्थ्य की चिन्ता करने की न तो ‘आवश्यकता’ है और न ही उन्हें ‘नैतिक अधिकार’ है। समाज जैसा चल रहा है, चलने दें। वर्तमान सरकार की युवापीढ़ी-विरोधी नीतियों से दुष्प्रभावित होकर, आज युवापीढ़ी जिस भी ढंग से जी रही है, उसे जीने दें।

युवापीढ़ी यदि लड़खड़ाना जानती है तो उसे सँभलना भी आता है। “पर उपदेस कुसल बहुतेरे” को चरितार्थ करने की कोई आवश्यकता नहीं है; क्योंकि नरेन्द्र मोदी! :–
“हमारे हौसले को तुम क्या मिटाओगे,
तुमने तो उड़ने का हुनर हमसे सीखा है।”

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २१ जुलाई, २०१८ ईसवी)