कवि राजेश पुरोहित, भवानीमंडी

चाहता है आदमी आसमान को छू लूँ।
चाँद तारे तोड़ लाऊँ धरती को सजा लूँ।।
चाहता है आदमी सोने का महल बनाऊं।
चांदी कर दरवाजों को घर पर लगा दूँ।।
चाहता है आदमी भौतिक विलास में रहूँ।
न तनिक हिलूँ न मेहनत रत्ती भर करूँ।।
चाहता है आदमी मशीनों से मैं काम लूँ।
बैठा बैठा ही धरती , अम्बर को नाप लूँ।।
चाहता है आदमी एक विश्व ग्राम बना लूँ।
विश्व के सभी आदमी को एकता में बांध लूँ।।