एक अभिव्यक्ति
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
महसूस तो अब होता है बहुत,
ज़िन्दगी को है उलझाया बहुत।
पाया कब और खोता रहा कहाँ,
इन प्रश्नों को है सुलझाया बहुत।
हर चौराहे पर प्रश्न लटकते रहे,
लोकसत्ता उसने भरमाया बहुत।
सच सिरहाने बैठा रहा चुप्पी साधे,
भीड़ ने झूठ को गले लगाया बहुत।
दूरियाँ नज़दीकियाँ मृगतृष्णा बनीं,
चाहत को उसने है बहकाया बहुत।
एड़ियों के छाले कुरेदते रहे हर पल,
आश्वासन का मरहम लगाया बहुत।
शेख़ियाँ बघारता रहा मिट्टी का शेर,
मूढ़ जनता को उसने भरमाया बहुत।
आकण्ठ स्वार्थ में है डूबा वह रहता,
तिकड़मबाज़ी का गुण अपनाया बहुत।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २५ जून, २०१८ ईसवी)