आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक)
परीक्षा और परीक्षा परिणामों से निराश हुए बिना प्रतिभा के आधार पर अपने लक्ष्य का निर्धारण करें क्योंकि
“परीक्षा परिणाम बच्चों द्वारा दी गई परीक्षा का आकलन होता है न कि उनके समूचे जीवन और भविष्य का।”
परीक्षा परिणामों से भयभीत बच्चों के द्वारा निराशा में उठाए गए कदमों के लिए हम सिर्फ उन्हें ही दोषी नहीं ठहरा सकते क्योंकि कहीं न कहीं दोषी हैं वे अभिभावक जिन्हें ९०-९५%से कम स्वीकार नहीं,दोषी है यह समाज जो संवेदनहीन हो खुद को और बच्चे को आधुनिकता की होड़ में शामिल कर हर समय बच्चे से सिर्फ़ जीतने की उम्मीद लिए बैठा है आखिर क्यों बच्चे की एक भी हार उसे स्वीकार नहीं।
बच्चों के सपनों को अनदेखा न करें, उनकी तुलना किसी अन्य से न करें और न अपने बच्चे को अपना ‘स्टेट्स सिम्बल’ बनाएँ।
ऐसी मानसिकता त्यागनी होगी तभी एक स्वस्थ और सफ़ल समाज का निर्माण हो सकेगा। “
असफलता’और ‘हार’ से निराश नहीं होना चाहिए -यह जीतने की पहली सीढ़ी हो सकती है,क्योंकि हर बड़ी सफलता के पीछे लम्बा संघर्ष और अनेकों असफलताएँ छुपी होती हैं।”
बच्चों को सही दिशा में प्रोत्साहित करें बज़ाय उसे कोसने के अथवा उसकी तुलना अन्य किसी से करने के।
ऐसे सभी अभिभावकों और शिक्षकों को चाहिए कि वे सकारात्मक बनें और बच्चों को भी सकारात्मकता सिखाएँ ।
*१:-परखें बच्चे का सर्वश्रेष्ठ गुण।
शिक्षा और परीक्षा को लेकर बच्चों,अभिभावकों तथा शिक्षकों को सामन्जस्य की अति आवश्यकता है आख़िर अभिभावक क्यों सिर्फ़ टॉप करने की उम्मीद पर ही जीते हैं ।
ध्यान रखिए टॉप कोई एक ही करता है वह आपका बच्चा हो सकता है किन्तु आप ही का बच्चा टॉप करे यह ज़रूरी नहीं ,इसका अर्थ यह भी नहीं टॉपर्स के अतिरिक्त सारे बच्चे बेकार हैं।
टॉप करने के लिए उसे तरह-तरह से तैयार करना ,दबाव बनाना ,मानसिक रूप से प्रताड़ित करना ,तुलना करना,अपने स्वप्नों को बच्चों पर थोप देना कतई उचित नहीं।ध्यान रखें ‘आपका बच्चा सबकुछ नहीं बन सकता’ किन्तु आप का उचित मार्गदर्शन पाकर किसी एक दिशा में सर्वश्रेष्ठ अवश्य बन सकता है अतः
सर्वप्रथम उसके सर्वश्रेष्ठ गुणों को परखें तत्पश्चात् उसे उसकी सकारात्मक दिशा में प्रोत्साहित करें।
२:-बच्चों को खुद चुनने दें अपना लक्ष्य।
प्रत्येक व्यक्ति का कोई न कोई सपना होता है आपके बच्चे का भी हो सकता है ।
उससे मित्रवत् व्यवहार करें,आवश्यकता पड़ने पर उचित मार्गदर्शन करें ,उसके साथ भावनात्मक और विचारात्मक रूप से हर समय खड़े रहें किन्तु यह अति आवश्यक है कि बच्चे को उसका लक्ष्य स्वयं निर्धारित करने दें “हर बच्चे की कार्य क्षमता और मानसिक स्तर भिन्न होता है” पता करें कि वे क्या कर पाएँगे ?आप एक अच्छे अभिभावक ,शिक्षक तथा मित्र की भूमिका निभाएँ उनपर अपने सपने पूरा करने का दबाव न बनाएँ बल्कि उनके स्वप्नों को समुचित मार्गदर्शन दें।
३:-उसे इन्सान बनने दें मशीन न बनाएँ।
अभिभावक और शिक्षक बच्चों के लिए निर्माता की भूमिका में होते हैं ऐसे में बच्चों से ऐसी आशाएँ न पालें कि वे आधुनिकता के इस आर्थिक युग में संवेदनहीन होकर सिर्फ़ मशीन बनकर रह जाएँ ।
उन्हें घर-परिवार,समाज और राष्ट्र की महत्ता भी समझानी चाहिए ताकि उन्हें मानव जीवन का मोल समझ में आए।
४:-सिर्फ़ पढ़ना ही ज़रूरी नहीं ।
बच्चों को हर समय सिर्फ़ पढ़ने के लिए न कहें उन्हें
खेल-कूद,बाग़वानी ,दूसरों के सहयोग आदि अन्य गतिविधियों में सम्मिलित होने दें ।बच्चों के लिए यह उतना ही ज़रूरी है जितना कि पढ़ना ,यह उनके व्यक्तित्त्व के बहुमुखी विकास में सहायता करेगा।
५:-उन्हें बनाएँ ज़िम्मेदार नागरिक ।
अपने बच्चों को आधुनिकता की दौड़ में भेजने के बाद अधिकांश माता-पिता इस बात से दुःखी हो उठते हैं कि जबसे बच्चा बड़ा हुआ अपनी जिम्मेवारियों से भागने लगा।इस विषम परिस्थिति से बचने के लिये उन्हें बचपन से वैचारिक और भावनात्मक रूप से भी इस तरह मजबूत करें कि वे अपनी जिम्मेवारियों को अपना कर्त्तव्य समझकर ख़ुशी- ख़ुशी उनका निर्वहन करें।