मातृभूमि ही इस युग की आराध्य देवी

डॉ॰ निर्मल पाण्डेय (व्याख्याता/इतिहासकार और लेखक) :

डॉ• निर्मल पाण्डेय

1921 से ही स्वतंत्रता की चाह रखने वाले योद्धा की तरह डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारतीय राष्ट्र की एकता और नैतिकता को प्रभावित करने वाले हर सूत्र के प्रति सजग पर एक लक्ष्यबद्ध विद्वान् की भूमिका का हमेशा ध्यान रखा। ‘मदर अर्थ’ नामक निबंध में उन्होंने इसी राष्ट्रीय चेतना को ध्यान में रखते हुए लिखा—

“मातृभूमि’ नए युग की आराध्य देवी हैं। इंद्र-अग्नि और शिव-विष्णु के युग ख़त्म हो गए। मातृभूमि की भौतिक सीमाओं का विस्तारीकरण हुआ है, पर वास्तविक रूप में सहस्त्राब्दियों में निर्मित यहाँ की लौकिक संस्कृति में ही असल में वह है; उसी धरती माता का अभिवादन आधुनिक युग कर रहा है, और उसी की परम-देवता के रूप में आराधना कर रहा है। प्राचीन काल से संजोयी गयी मातृभूमि के इस विरासत के प्रति लोगों को समर्पित हो जाने दो। हम में से हरेक को मातृभूमि की शरण में जाना चाहिए। धरती माँ इस युग की अधिष्ठात्री देवी हैं। आइये इसकी वंदना करें।”
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वासुदेव शरण अग्रवाल (1904-1966) राष्ट्रवादी चेतना से लबरेज प्राच्यविद्या के अप्रतिम विद्वान और भारतविद थे, जिन्होंने संहिताओं, ब्राह्मणों, उपनिषदों और पुराणों जैसे साहित्यिक स्रोतों तथा वास्तुशास्त्र, शिलालेख, पुरालिपि और पुरातत्व जैसे प्रामाणिक वैज्ञानिक विधाओं के संगम से भारतीय सभ्यता और संस्कृति का ऐतिहासिक निर्माण किया। उनकी इतिहासधारा पाश्चात्य विद्वानों के सतही, औपनिवेशिक उपयोगितावाद और विभेदकारी स्थापनाओं का देशज तरीके से खंडन करता है।

पारिवारिक पृष्ठिभूमि में प्राप्त धार्मिक ग्रंथों के शुरूआती प्रशिक्षण और संस्कृत भाषा पर अपनी पकड़ के कारण वासुदेव शरण अग्रवाल को वैदिक संहिताओं से लेकर पुराणिक रचनाओं और साहित्यिक स्रोतों को समझने की कुंजी प्रदान की, जिसने उन्हें प्राचीन भारत के इतिहास और संस्कृति को दर्शाने की देशज दृष्टि प्रदान की। उन्होंने अपनी इसी देशज दृष्टि से स्वयम को स्थानीय लोक संस्कृति से जोड़ा और पाया कि वैदिक रचनाओं और लोक परम्पराओं में एक भाषाई और सांस्कृतिक निरंतरता विद्यमान है। इसे उन्होंने वैदिक साहित्य में भाषाशास्त्रीय हस्तक्षेप द्वारा सिद्ध किया और इसी उद्देश्य से उन्होंने 1940 के दशक में देवेन्द्र सत्यार्थी और बनारसी दास चतुर्वेदी के साथ जनपदीय लोक संस्कृति आन्दोलन भी चलाया।

पाणिनि कृत अष्टाध्यायी के सूत्रों में वर्णित भारतीय सभ्यता के बिखरे सूत्रों को इकट्ठा कर ‘इंडिया ऐज नोन टू पाणिनि’ (1941) लिखी। इस शोध ने पाणिनि कालीन समाज की जिन मान्यताओं को रेखांकित किया उससे काल निर्धारण की नयी परिपाटी को अपनाने के लिए भारतविदों को प्रेरित किया। बाटा कृष्ण घोष जैसे विद्वानों ने जो पहले जर्मन जे. जॉली द्वारा ‘कौटिल्य के अर्थशास्त्र’ का काल चौथी शताब्दी ईसवी से मानते थे, वो वासुदेव शरण अग्रवाल के शोधोपरांत इस निर्णय पर पहुंचे कि कौटिल्य का काल पाणिनि काल के ज्यादा करीब बैठता है और इसलिए कौटिल्य द्वारा वर्णित कालक्रम ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के बाद नहीं रखा जा सकत। इस शोध ने ‘अर्थशास्त्र’ के काल को आठ सौ साल पहले का सिद्ध कर दिया।

ऐतिहासिक स्रोतों की छानबीन और अतीत के पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक आधुनिक विधाओं वास्तुशास्त्र, शिलालेखीय अध्ययन, पुरालिपि और पुरातत्व की तकनीकों के इस्तेमाल हेतु संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी में प्रवीणता ने वासुदेव शरण अग्रवाल को इस क्षेत्र में बढ़ने हेतु प्रेरित किया। मथुरा, लखनऊ और दिल्ली में संग्रहाध्यक्ष (क्यूरेटर) के रूप में कार्य करते हुए वासुदेव शरण अग्रवाल को भारत की समृद्ध वास्तुशास्त्रीय और पुरालेखीय विरासत के अध्ययन और पुनर्विवेचन करने का अवसर प्राप्त हुआ अग्रवाल ने न केवल इन संग्रहालयों को पुनर्व्यवस्थित, वर्गीकृत और सूचीबद्ध किया वरन संस्कृत साहित्य में टुकड़ों में बिखरी भारतीय कला परंपरा को सूत्रबद्ध भी किया।

भारतीय कला और संग्रहालीय विज्ञान विधा से इतर वासुदेव शरण अग्रवाल का वेदों के अध्ययन और उसकी व्याख्या में शुरू से ही मूल रुझान था। इसे वह वेद-विद्या कहा करते थे। पाश्चात्य विद्वानों द्वारा वैदिक व्याख्या के प्रस्तावों का खंडन करते हुए उन्होंने इस बात को रखा कि “वेदों को लेकर वर्तमान शोध की जो इमारत खड़ी है वह पिछले डेढ़ सौ साल के पाश्चात्य विद्वानों द्वारा वैदिक सूक्तों और ब्राह्मणों, उपनिषदों में वर्णित पारंपरिक टीकाकारों और भाष्यकारों के निष्कर्षों की सतही धरपकड़ का नतीजा है, जो तुलनात्मक धर्म, तुलनात्मक संस्कृति और तुलनात्मक भाषाशास्त्र के रूप में व्यक्त हुआ है, जिसने बमुश्किल वैदिक व्याख्या की वास्तविक समस्या ‘वैदिक तत्वमीमांसा और कास्मिक प्रतीकवाद’ के रहस्यों पर से पर्दा उठाने की कोशिश की है और वे तत्व-मीमान्सीय व्याख्या के के अविरल तंत्र के निर्माण और वैदिक गुप्त ज्ञान के मायनों की गहराई समझने में विफल रहे है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अकेले भाषाशास्त्रीय शोधदृष्टि वैदिक पाठों को समझने के किये अपर्याप्त है। उसकी सही व्याख्या संहिताओं, ब्राह्मणों, उपनिषद और पुराण सरीखे साहित्यिक स्रोतों की मदद से ही संभव है।”

डॉ. अग्रवाल ने वैदिक शब्दों और पारिभाषिक शब्दावलियों के पीछे छुपे प्रतीकवाद का विश्लेषण करते हुए बताया कि, “ऋग्वेद में वर्णित विचार प्रतीकों के साँचे में ढाले गए हैं। इसलिए प्रतीकवादी दृष्टिकोण वैदिक व्याख्या और समझ का द्वार खोलते हैं और वही ‘अर्थों’ की समझ को अपूर्व समृद्धि प्रदान करते हैं। वास्तव में प्रतीकवाद का यह प्राचीन पारंपरिक तरीका ‘ब्राह्मण ग्रंथों’ से ही लिया गया है।”

अपने अध्ययनों से उन्होंने बताया कि वैदिक प्रतीकवाद मिथकीय रूप में पुराणों के माध्यम से ही आम जन में पहुंचा। आगे चलकर पुराणों ने प्राचीन वैदिक विचार प्रक्रिया को किस्सागोई के इन्ही रुचिकर तरीकों द्वारा आमजन को शिक्षित किया।

ऐतिहासिक तार्किकता और विद्वत्ता के शिखर पर रहते हुए, डॉ. अग्रवाल ने अपनी राष्ट्रीय चेतना को मातृभूमि की अर्चना निरूपण और उसके दैवीय महत्ता को युगीन दृष्टि के अनुसार शास्त्रबद्ध किया। अध्ययन क्षेत्र की अपनी विविधता के स्पष्टीकरण के तौर पर बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखे एक पत्र में बकौल खुद डॉ० अग्रवाल कहते हैं कि, ‘मेरा मस्तिष्क ज्ञान-कक्षों के कई खण्डों में विभाजित है और मेरा मस्तिष्क एक कक्ष से दूसरे कक्ष में लगातार विचरण करता रहता है।” प्राच्य विद्या के विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ कई रंगतों में वासुदेव शरण अग्रवाल की उपस्थिति इसी विचरण का परिणाम स्वरुप प्रतिबिंबित होता है।
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मधुमेह से पीड़ित वासुदेव शरण अग्रवाल का चौवन साल पहले आज के दिन 26 जुलाई 1966 को वाराणसी में देहावसान हुआ। पुण्यतिथि पर इतिहासलेखन पर सशक्त भारतीय हस्ताक्षर की लेखनी को नमन।

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  • निर्मल पाण्डेय
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    स्पष्टीकरण: भाषा-शैली-कंटेंट के स्तर पर उपरोक्त लिखा बहुत-कुछ राजकमल से 2013 में प्रकाशित ‘समाज विज्ञान विश्वकोश’ के लिए ‘वासुदेव शरण अग्रवाल’ (भाग पाँच, pp.1724-1726) पर लिखी गयी मेरी स्वयं की प्रविष्टि से लिया गया है।