धरती की पीड़ा

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-

हे कविते! सुन लो करुण पुकार,
अचला धोती दृग निज अश्रुधार।
माँ हूँ मैं यह कहते दानव मानव,
नित करते फिर क्यों बंटाधार ?
कविते! कविते! हे! कविते ,
मैं देती नित इनको निज हृदय चीर,
फिर भी यह देते नित क्यों मुझे पीर?
आँचल मैला यह क्यों करते हैं ?
नित हृदय चुभोते रहते हैं तीर ।
मैंने खोला नित अपना अक्षय भण्डार,
पर इनके दृग भरे हुए लिप्सा के अंगार।
कविते!मुझको यह बतलाती जाना,
क्यों मेरे भाग्य लिखा यह दुःख पाना।
मैंने नित देखा जग को समदर्शी ,

यह सब ही हैं मेरे हृदयस्पर्शी ।