फागुन को यहौ एकु रूपु

हैंडपम्प उगलय हबा कुइयाँ परी उतान ।
का गति होई जेठ कय फागुन बइठ स्वचान।
टाटा कहि के गहि लिहिस पानी गइल पताल।
लइ लइ डब्बा बालटी मनई फिरइ बेहाल।
फागुन बचा न नंचुअव पानी सउचय जोग।
बइसखहा नरबा कहइ तऊ गाँव के लोग।
अमरित जल बाटिन जउन कुइया बउली ताल।
सोधई दोहनी अस धरे कइके हाल बेहाल।
बूड़ जाय हाथी सइघ जउन तलाये बीच।
तउने मा अब तो बचा रहिगा कादव कीच।
कउन तरक्की का खुला रामदही कय द्वार।
सहमे सहमे सब लगय जंगल नदी पहार॥

–बाबूलाल दहिया (पद्मश्री)