©जगन्नाथ शुक्ल….✍ (इलाहाबाद)किस हक़ से कहते हो कश्मीर हमारा है,
खुद के हाथों भारत माँ का शीश उतारा है।
ग़र चाहत है खुशियाँ बरसें लहराये केसर घाटी में,
३७०धारा ख़तम करो,धरती ने आज पुकारा है।।
खुद की हिम्मत से हिम्मत बाँधो,
क्यों डरते हो प्रतिबन्धों से।
प्रतिबंधित करने तक हैं सीमित,
उन वैदेशिक अनुबन्धों से।
गाँठें खोलो साफे बाँधों,
कर दो लोकतन्त्र का शंखनाद।
फिर कोई चीरहरण की ग़र सोचे,
चढ़ जाओ छाती पर कर सिंहनाद।
आडम्बर अब बहुत हुआ,
अपना साहस एकमात्र सहारा है।
ग़र चाहत है………………………. ………………….
है टू प्लस टू जैसी बातों का शोर,
है वाशिंगटन और बीजिंग में होड़।
हम राणा और शिवा के वंशज हैं,
अपनी रास न कुत्तों के हाथों में छोड़।
हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्रहरी,
हाथ पे हाथ धरे हुए हम-सब,
उठो सभी एक साथ अभी,
कश्मीर प्रान्त नही स्वाभिमान हमारा है।
ग़र चाहत है………………………. ………………………