--- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भोजपूरी के हड़ाह लिक्खाड़), परियागराज
भोजपूरी ‘चिनियाबादाम’ न हवे ए बाबू कि अँगुठवा दबाई के फोरि देहला आ मुँहवाँ में ढुकाइ लेहल। जेकरा फराकी ठोकला के बदिया……धोवे के सहूर ना होखेला, उहो ‘भोजपूरी के महन्थ’ बन जा ता आ मंच के आपन बाप-दादा के समुझि लेता। बलिया, ग़ाज़ीपुर, देवरिया, आरा, छपरा में अइसन-अइसन ‘करिकवा साँप बाड़न स कि खाली फोंफियात रहलन स। माइक के अइसे पकड़लन स जइसे लागे लागल कि कवनो रम्भवा, मेनकवा भा उरबसिया के बाँहीं में भरले बाड़न स। काहें से उ मइकवा के छोड़े के नमवे ना लेलन स। इहे सभ उहनी के रहनिया हवे आ करनियो। एही कुल्हि कुकरमावा से अबु ले भोजपूरी ओहिजे बिया, जहवाँ काल्हु ले दाँड़ि-बइठक करत रहे। जइसन कवनो राँड़ि के माँगवा में सेनूर भरि द ओही तरी आजु भोजपूरी के दुरगतिया लउकता। भोजपूरी के आपन खेती समुझे वाला लोगवा मुँहवा में करिखा पोताई के बइठल बाड़े। खाली भोजपूरी के ककहरा पढ़ला आ पढ़ईला से कमवा ना नू चली ; ओकरा खातिर नीमन-नीमन भोजपूरी बोलिया में ‘पदवा’ आ ‘गदवा’ में खूब झकझोरी के लिखे के परी तब जाइके बुझाई की कुछु लिखल गइल बा। ना त कवनो करम के गति ना होखी। खाली कबितवा के चारा बनाई के साहित के नहरिया में ढुकाइ के मछरी ना नू फँसावल जाला; मछरिया लेखा पठकवन के मनवाँ साहित के लगे खींचे के खातिर तनी ‘चटक-मटक’– कहानिया, उपनिसवा, नाटकवा लिखे के परे ला तब जाइके मामला फिट होखे ला।
बुझाइल कि ना ए उखाड़न चाचा आ तिरछोल चाची?
मंचवन पर ‘जिला हेलावन’ मेहररुवन के ढुका लगाइके बैठाई के भोजपूरी के नास मत कर लोग। कवनो अखड़ाबाज ता इहो ना जाने ला की भोजपूरी के लँगोटा कइसे बान्हल आ कसल जाला। भासा ह की बोली ह; आ ह त काहें ह? एकोरिया से माठाधीस भोजपूरी के जड़वा में माठा डाले के काम कर तारन स। उहनी के गिरोहि बनाई के अठँउवाँ अनुसूचिया में भोजपुरी के भासा बनवाए खातिर तमासा कर तार न स। उहनी के ई नइखे बुझात कि भोजपूरी खाली एगो बोली ह आ ओकर भासा ‘हिन्दी’ हवे। त हिन्दिया के हिन्दिए रहे द लोग आ भोजपूरी के बोली। आपन खाए-पिए के जुगाड़ करे के फेर में भोजपूरी के मैजल निकाले के तइयारी मत कर लोग।
भोजपूरी नान्ह बिया आ सयानो बिया; बूढ़ो बिया, बाकिर आपन जब घूँघटा उठावले त बड़न-बड़न के हाबा-डाबा होखे लागेला; इसिनफिलिया पकड़ि आ जकड़ि ले ले ला। एतने ना, हिरदयवा धुकुर-पुकुर, धुकुर-पुकुर करे लागे ला। एही से नीमन आ नीक इहे कहाई की ‘भासाबाजी’ करे के कवनो ठीका लेबे के जरूरत नइखे। भोजपूरी त गांगा आ जमुना जी के धार हवे; ओकरा के रोके के केहू के बेंवत नइखे। ओकरा चुपेचाप बहे द लोग।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ अगस्त, २०२० ईसवी।)