
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
ओकर बियहवा बिदेसे में कराई दीहल जाऊ का? आपन ओनिए रहि के फरियावत रही। काहें से कि जब देख तब, ओकरा गोड़वा में शनिचरे चढ़ल रहेले। हमरा इहो लागता कि ओ जनम में ऊ बिलायते में जनम लेले रहे। ‘मेरा साया’ फिलिम लेखा ओह जनम के ओकरो कवनो मेहरारू बिया; तबे नू, उ जइसे ए देसवा में आवेला त ओकरा कल ना पड़ेला। कबो हेने त कबो होने उधियाइल फिरे ला।
आच्छा त छोड़ीं। काँहे से हमरा पजरी आवे से चाचा छछून्हर बरावत फिरे ले। एसे कि ऊ झूठ के समुदर हवे। आ हमु उनकर कुल्हि गुनवा जाने लीं। ऊ एक नम्बरी हवे त हमहूँ दस नम्बरी हँयी।
इहे कुल्हि सोचत-साचत खेत आ डाँड़ार के नापत-जोखत हमु चलल जाति रहनी कि एगो आदिमी भेंटाइ गईल। ऊ पाठा आपना कान्हवाँ पर एगो बोरिया लदले रहुवे। एगो लाल रंग के जाकिट आ खूब सूनर पाइण्ट पहिने रहुए। लागत त इहे रहुए कि केनो से झटक-झुटुक के ले आइल होखे। बुझात रहुए कि ‘अली बाबा चालीस चोर’ के सरदार हवे। फस किलास के सफ़ेद दाढ़ी में ऊ बाड़ा सुघर-साघर लागत रहुए। अपना गरदनिया में लाल आ हरियर रंग के गामछा लटकऊले रहुवे आ मुड़िया में गोलकी टोपिया पहिनले रहुए।
ओकरा काहला पर ओकरे कान्हवाँ पर से ओ बोरिया के उतारि दिहिंवीं। ऊ बाड़ा घबराईल लऊकत रहुवे। एही से हम ओकरा से पूछि दिहिंवीं— का हो चाचा! अनेरिया गाइ लेखा काहें लऊकतार?
ऊ बतावे लगुवे— अरे! का-का बताईं तहरा के। पहिले हमरा के दीसा-मैदान जाये खातिर कवनो नीमन उपाइ बताव?
त हम कहनी— अरे चाचा! काँहें के अझुराइल बाड़। हऊ, जवन ऊखी के खेतवा लऊकत बा, ओही में घुसि के फराकी ठोकि आव। एतना सुनते ऊ परदेसी चाचा फर्राटा मार के ऊखी के खेतवा में घुस गइलन।
आ एने हमरा दियानत में एगो चोर घुसि गईल रहे। काँहे से कि ओकर बोरियवा तनी हिलत-डोलत रहुवे। हम ओकर बोरिया के खोले लगनी। थोड़िए देरिया में ओकर बोरिया में से हाँफत-काँपत ‘स्टार्ट अप् इण्डिया’ निकलुए; आ निकलते आपन परान लेके भाग पड़ुए। ओकरा बाद त लाइन लागु गईल रहुवे— ‘मेक इन इण्डिया’, ‘डिजिटल इण्डिया’, ‘स्मार्ट इण्डिया’ आ दूका-दूका इण्डिया निकलनन स। आ एके झटका में सभ भाग गइलन स।
आ हम त उ कुल्हि देखि के सकपकिया गईल रहनी। आ डेराईलो गईल रहनी कि ऊ बुढ़वा आई त आपन खलिहा बोरी देखि के हमरा के का-का कही। एतना बतिया आवते, हमार माथा ठनकि गईल। हमार मन एगो जोरदार राहता निकालु देहलसि। आ ऊ की एही लगली झाड़ा फीरे के बहाना तेहूँ निकलि जाऊ। आ बुढ़वा पूछी त बता दीह की हमहूँ दीसा-मैदान गईल रहनी हाँ। एतना नीमन उपाइ के हमु हथवा से ना जाए दिहनी। एही से ओही लगे नहरी के नीचे उतरि के आ चुपियाई के बईठि गईनी। आ जेने खलिहा बोरिया रखल रहुवे, ओनिए कनखियाइ के देखत रहनी।
ओतने में ऊ बुढ़वा ओहिजे चहुँपल रहुवे। आ एने-ओने देखत रहे। आ पाँचु मिनट के बाद ओहिजे हमहूँ चहुँप गईनी।
हामरा के देखते लाल-पियर मुँहवाँ बनाई के ऊ खिसियाई गईल। पूछे लगुए— तू हामार ई बोरियवा खोलले रहल हा का?
त हम बोलनी— भे मरदे! इ तू का कहतार। एने तू गईल आ ओने हम गईनी। हमरो नू फराकी ठोके के रहल हा। काँहें के मनवाँ थोर कईले बाड़े? चल हामरा घरे। तहरा पनपियाऊ देब आ एगो नीमन बोरवो।
एतने में, ऊ रोवे लगुवे आ कहे लगुवे— ई कवनो अईसन-वईसन बोरिया ना रहल हा। एमे हमार चारि साल के कमाई धन रहल हा। ए बोरा में ऊ-ऊ चिजिउवा रहल हा, जेकरा के देखाई-देखाई के एईजा (भारत) के लोगवा के पिछला चारि सालि से बझवले आ बुरबक बनावत आईल रहली हाँ। अब त हमरा पासे दोसर कवनो उपईए नईखे।
एतना में, हमार बुचिया हमरा के हिलाई-डोलाई के जगाई दिहुए आ हम चकचोन्हर लेखा एने-ओने देखत रहि गवनी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २७ जून, २०१८ ईसवी)