क्यों चच्चा-बोल बच्चा?– दो

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बच्चा– चच्चा! एक बात बताओ?
चच्चा– बोल बच्चा?
बच्चा– कल आप और चच्ची को आपके दोनो बेटे खरी-खोटी सुना रहे थे।
चच्चा– तो क्या हुआ?
बच्चा– वे तो यह भी कह रहे थे– घर मे निट्ठल्ले पड़े रहते हो।
चच्चा– तो क्या हुआ?
बच्चा– अरे चच्चा! दोनो बहुएँ अपने पतियों से जानते हो क्या कह रही थीं?
चच्चा– नहीं मालूम।
बच्चा– दोनो कह रही थीं– सुनो जी! इन खूसठ बूढ़े-बूढ़ी को घर से निकालो, वरना ये हमे लूट लेंगे। तुम कमाते हो और ये बूढ़े-बुढ़िया बैठे-बैठे रोटी तोड़ते हैं। ऐसे कब तक चलेगा?
चच्चा– तो क्या हुआ?
बच्चा– चच्चा! वे तो इस घर मे तुम दोनो को छोड़कर कहीं और रहने के लिए कह रही थीं।
चच्चा– तो क्या हुआ?
बच्चा– अरे चच्चा! तुमने तो उनको पैदा किया; पाला-पोसा और अच्छी-से-अच्छी शिक्षा दिलाकर एक बड़ा अधिकारी बनने मे अपना सब कुछ लुटा दिया और वे तुम दोनो को अब भार समझ रहे हैं।
चच्चा– बच्चा! इसीलिए सरकारी नौकरी करनेवालों को ‘पेंशन’ दी जाती है। पेशनधारी व्यक्ति कम-से-कम इज़्ज़त की दो रोटियाँ तो खा सकता है।
बच्चा– पर चच्चा! तुम्हें तो कोई पेंशन मिल ही नहीं रही है, फिर कैसे बात बनेगी? तुम्हारे बेटे और बहू तो तुम्हें छोड़कर जानेवाले हैं। तुम दोनो वृद्धाश्रम मे भी तो नहीं रह सकते; उसमे भी रहने के लिए किराये चाहिए।
चच्चा (एक गहरी साँस छोड़ते हुए)– हाँ बच्चा! यही तो रोना है। अटलबिहारी वाजपेयी ने ऐसा काम किया, जिससे हम बूढ़ों की ज़िन्दगी ही हमारे परिवार पर ‘बोझ’ बन गयी।
बच्चा– चच्चा! वह कैसा?
चच्चा– उन्होंने हम सबके जीवन का आधार ‘पेंशन’ को ही बन्द करा दी।
बच्चा– मगर वाजपेयी जी तो एक सहृदय व्यक्ति, उत्तम कवि और भावुक माने जाते थे।
चच्चा– तुम ठीक कहते हो; पर जानते हो न, हाथी के खाने के दाँत और दिखाने के अलग-अलग होते हैं।
बच्चा– चच्चा! अपना पड़ोसी तो तीन-तीन बार विधायक रह चुका है और एक बार सांसद भी बनाया गया था; मगर वह तो जितनी बार विधायक और सांसद रहा, वह उतनी बार पेंशन पाता रहा है।
चच्चा– बच्चा! यही सब तो मिलकर क़ानून बनवाते हैं और सबसे पहले अपने और अपने परिवार की सुरक्षा, सुविधा-साधन के लिए व्यवस्था करा लेते हैं।
बच्चा– तो चच्चा! यह ग़लत काम नहीं है, फिर उनके पास वैसे ही रुपये की कोई कमी नहीं है?
चच्चा– बच्चा! वे सब बहुत बड़े लोग हैं; उनके लिए तो सात ख़ून भी माफ़ हैं।
बच्चा– तो चच्चा! वे सब पक्के गुण्डे होते हैं। उनसे पुलिस, थाना, डी० एम० सब डरते हैं।
चच्चा– नहीं बच्चा! ऐसा नहीं कहते। वे तो ‘कलियुग के भगवान्’ हैं। हम सबके माई-बाप हैं। उनके ही इशारे पर पत्ते हिलते हैं; मौसम बदलता है।
बच्चा– चच्चा! इसका मतलब यह है कि वही हमारे ‘भाग्यविधाता’ हैं; मगर चच्चा! यह बताओ, वोट मागते समय तो वे ‘भिखारियों’ से भी गये-गुज़रे दिखते हैं और जीत जाने के बाद ‘गुण्डे’ बन जाते हैं।
चच्चा– हाँ बच्चा! तुमने ठीक कहा है; पर यही तो उनकी ‘विशेष योग्यता’ कहलाती है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ मार्च, २०२२ ईसवी।)