आइए! ‘कविता और कवि’ का परीक्षण करें और समीक्षण भी

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

सम्भवत: कोई पारंगत कवि हो, जो समग्र मे अपने गीतात्मक रचना और अन्य छन्दबद्ध सर्जन करते समय भाषा और छन्द के साथ न्याय कर पाता हो। वैसे सर्जक की पीठ ठोंककर, उसे ‘सूखा पत्ता’ बनाकर किसी गड्ढे मे गिरानेवाले कम दोषी नहीं होते; वैसे परिवेश मे किसी भी रचनाकार को कुछ देर के लिए ठहरकर स्वयं से प्रश्न भी करना होगा :– क्या ऐसे लोग की वाहवाही मुझे किसी अदृश्य गर्त मे धकेल तो नहीं रही है, जिन्हें न तो छन्दशास्त्र का बोध है और न ही भाषा का संज्ञान?

खेद है! ऐसे लिक्खाड़ों की संख्या विश्व की कुल जनसंख्या से भी कई गुणी है। अधिकतर रचनाकार न तो शिल्पगत संस्कार से अवगत हैं और न ही बिम्बविधान और प्रतीक-योजना से। काव्य मे शब्दशक्ति की अतिशय महत्ता रही है।

कोई कवि जो कुछ भी लिख दे, वह कविता नहीं है; क्योंकि कविता ‘लिखी’ नहीं जाती, ‘रची’ जाती है। कोई भी रचना ‘मन-प्राण’ का विषय होता है, फिर रचना मौलिक चिन्तन-प्रवाह का ‘प्रभाव’ होती है। कविता सीधे मार्ग पर भी चलती है, जो किसी भी कवि-कवयित्री के लिए सहज गमन का विषय नहीं है; क्योंकि किसी भी प्रकार की कविता मे यदि रस-छन्द-अलंकार नहीं हैं तो वह ‘कविता’ की श्रेणी के अन्तर्गत रेखांकित हो ही नहीं सकती। इसका मुख्य कारण यह है कि उक्त तीनो ही ‘काव्यांग’ कहलाते हैं।

कविता ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर गतिमान रहती है; उसकी गति आड़ी-तिरछी रहती है; सर्पिलाकार मे सरकना जानती है तथा भाव की उच्चता और गहनता के आधार पर अपना गतिपरिवर्त्तन करते भी देखी जाती है।

मेरा सुस्पष्ट मत है कि वास्तव मे, जब एक परिपक्व रचना सार्वजनिक होती है तब उसमे भाव-भाव के चरम उत्कर्ष का अनुभव किया जाता है। सुख की चरम अनुभूति हो वा (अथवा) दु:ख की हो, कृतिकार बार-बार टूटता है; बुझता है; लुटता है और टप्-टप् अश्रु-स्नात (आँसू (‘आँसुओं’ अशुद्ध है।) मे स्नान किया हुआ) होकर परम आनन्द की उपलब्धि अर्जित करता है और जैसे ही वह पूर्णता की प्राप्ति कर लेता है, एक ‘प्रसूता’-सदृश मधुर अनुभव प्राप्त करने लगता है; क्योंकि समयसत्य सर्जन करने के लिए ‘कृती (पारंगत) कृतिकार को ‘प्रसव-पीड़ा’ को भोगना ही पड़ता है। वाल्मीकि (‘वाल्मीक’, ‘बाल्मीक’ तथा ‘बाल्मीकि’ अशुद्ध हैं।) ने क्रौंच-युगल की प्रणयलीला के समय आखेटक-द्वारा उसकी नृशंस हत्या होते देखकर जिस वेदना (“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:। यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।’) का अनुभव किया था और उसकी जिस करुण रस-रूप मे अभिव्यक्ति की थी, उसका परिणाम यह रहा कि वह ‘वाल्मीकि रामायण’ का आधारभूत श्लोक के रूप मे लोक-विश्रुत (लोक मे उत्तम प्रकार से सुना हुआ) हुआ और वाल्मीकि ‘आदिकवि’ के रूप मे सर्वमान्य रहे।

कवि की गति अबूझ पहेली-भाँति होती है। इस दृष्टि से उसकी अनुभूति की सत्ता और महत्ता उत्तुंग शिखर पर समासीन रहती है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ अगस्त, २०२२ ईसवी।)