——०एक अभिव्यक्ति०——
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कोई कट गया उनकी नज़रों से,
पर्द: हट गया उनकी नज़रों से।
झुकीं निगाहें क़ह्र बरपाती रहीं,
मन फट गया उनकी नज़रों से।
ग़ैरों मे शामिल थे और अपनो मे,
अपना बँट गया उनकी नज़रों से।
बज़्मे महफिल सजी, उखड़ गयी,
सपना छँट गया उनकी नज़रों से।
ताउम्र सहलाये परायों के तलुए,
अपना घट गया उनकी नज़रों से।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)