जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-
भूख तन में लगी हो या मन में लगी,
बिन मिटाये ये ख़ुद से मिटेगी नहीं!
जिसने ग़ुरबत के दिन हैं बिताये नहीं,
क्षुधा ग़ैर की उसको दिखेगी नहीं!
जिसका तन है हरा और मन है भरा,
भावना उसके मन में जगेगी नहीं!
जिसका उदर भूख से होगा विकल,
उसकी लम्बी ये रातें कटेंगी नहीं!
क्षुधा हो प्रिये या फिर हो तिश्नगी,
बिन मिटाये ये दुनियाँ चलेगी नहीं!
कोई खा खा मरे कोई भूखा मरे,
इंसानियत क्या यहाँ पे रहेगी नहीं!
खोल के पौशले तू बढ़ा हौसले,
मुस्कुराहट कभी फ़िर घटेगी नहीं!