जब वैलेंटाइन-डे न था

जब वैलेंटाइन डे न था तब होता क्या प्यार न था।
अरे प्यार तो था उस जमाने में भी पर आशिकों का ऐसा किरदार न था।
जिया करते थे जन्मों जन्म दो प्यार करने वाले एक दूसरे के लिए,
सुना है उस जमाने में दिल बिकता यूँ सरे-बाजार न था।
भूल जाते थे वो जमाने को चाहत में एक दूसरे के लिए,
चंद कुछ पैसों और दौलत में बिक जाये वो इश्क़ इतना लाचार न था।
जब वैलेंटाइन डे न था तब होता क्या प्यार न था।
रांझे और हीर के किस्से सुनाये जाते हैं आज भी महफिलों में,
तब एक दिल दो जान हुआ करते थे यूँ जिस्म का व्यापार न था।
अब तो गिरगिट की तरह रंग बदलते देखा है दिलों को मैंने यहां,
बन जाती थी मूरत प्यार करने वालों की पर उस ज़माने में कोई यूँ त्यौहार न था।
जब वैलेंटाइन डे न था तब होता क्या प्यार न था।

—शीतांशु किरण त्रिपाठी