राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’–
मेरी जिन्दगी की यारों शाम भी अब ढल गयी।
क्या से क्या हो गया और किस्मत बदल गयी।
स्वप्न मेरे उससे टूटे जो सुबह थी और शाम थी।
हाय किस्मत देखिए मुझे गुनहगार बना दिया।
मेरे अरमानो पर पैर रख उठने की कोशिश मे।
उसने ही खुद को जलाया और हमे फँसा दिया।
न जी पा रहा हूँ ‘राघव’ न मरने से चैन आएगा।
रो-रोकर सूख गये हैं आँसू कितना तड़पायेगा।
सबकी अपनी ज़िन्दगी और सबकी कहानी है।
रोयेगा वो जो अपनी ज़िन्दगी ग़ैर को बनायेगा।
Related Articles
क्या खता हुई है हमसे तू मुझे याद करती नहीं
October 15, 2018
0
कविता : झूठी यारी
June 17, 2022
0
मै चरणदास समाज हूँ
December 15, 2022
0