समूचे ‘सिस्टम’ की प्रामाणिकता और निष्पक्षता को संदिग्ध बनाता, सी० बी० एस० ई०

सी० बी० एस० ई०-परीक्षाकाण्ड– दो

इन दिनो भारत के विद्यालय-स्तरीय प्रमुख बोर्ड ‘केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद्’ (सी० बी० एस० ई० : सेण्ट्रल बोर्ड ऑव़ सेकण्डरी एजुकेशन), जिसकी स्थापना १९२९ ई० मे की गयी थी, की समूची कार्यशैली पर इतने प्रश्नचिह्न लग चुके हैँ कि जैसे ही एक प्रश्न का उत्तर देने के लिए उसका प्रबन्धन खड़ा हो रहा है, दूसरे-तीसरे-चौथे प्रश्न चुनौती लेकर प्रस्तुत होते जा रहे हैँ; क्योँकि स्कूली शिक्षा मे बारहवीँ की बोर्ड-परीक्षाएँ छात्र-छात्राओँ के भविष्य के लिए नीवँ और दिशा का निर्धारण करती हैँ। काग़ज़ पर यह बोर्ड अत्यन्त कठोर अनुशासन और पारदर्शिता के लिए प्रसिद्ध है; क्योँकि यह भारत-सरकार-द्वारा प्रबन्धित और नियन्त्रित है; बावुजूद यदि उसी मे घोर अनियमितता और कदाचार हो तथा आरोपितोँ को बचाने की निर्लज्ज कोशिश हो तो माता-पिता, अभिभावक और उनके बच्चे किस पर भरोसा करेँ? केन्द्र-सरकार के शिक्षामन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान इसे घोर लापरवाही तो मानते हैँ; परन्तु अपनी नैतिक ज़िम्मादारी से भागते फिर रहे हैँ। उन्हेँ केन्द्र-सरकार के ही रक्षामन्त्री राजनाथ सिँह के उस बयान से बल मिलता है, जिसमे उन्होँने कहा था :– एन० डी० ए० मे इस्तीफ़ा देने की परम्परा नहीँ रही है। यही कारण है कि अभी तक जितने प्रश्न केन्द्रीय शिक्षा-मन्त्रालय-द्वारा पोषित बोर्ड के पाले मे उछाले गये हैँ, सब-के-सब अनुत्तरित हैँ। हमे जानना चाहिए कि इस नयी परीक्षण और मूल्यांकन-डिज़िटल-प्रणाली से पहले परीक्षकोँ-द्वारा स्वयं अपने हाथोँ से (मैनुअली) परीक्षण करने की ही परम्परा रही थी; क्योँकि उस परीक्षण-पद्धति के अन्तर्गत मनुष्य का विवेक केन्द्र मे रहता था; परन्तु सी० बी० एस० ई०-प्रबन्धनतन्त्र ने डिज़िटल-माध्यम से उत्तरपुस्तिकाओँ के तीव्रतर गति मे परीक्षण और पारदर्शी तरीक़े से मूल्यांकन कराने का जिस तर्क को प्रस्तुत करके, ओ० एस० एम० (ऑन-लाइन स्क्रीन मार्किंग)-प्रणाली को लागू किया है, अब वह अपनी विसंगति के कारण छात्र-छात्राओँ के भविष्य के लिए घातक सिद्ध होने लगा है। कथित प्रबन्धनतन्त्र के लिए यह लज्जा का विषय बन चुका है कि आज छात्र-छात्राओँ का भविष्य लीलने के लिए ऐसी व्यवस्था की गयी है। इस व्यवस्था को विश्व के शताधिक देशोँ मे लागू किया गया है; किन्तु वहाँ प्रशिक्षित और कुशल परीक्षक हैँ, जो अपनी निपुणता का परिचय देते हुए, समुचित ढंग से उत्तरपुस्तिकाओँ का परीक्षण, मूल्यांकन तथा पठनीय स्कैन प्रतिलिपियाँ निकालने मे समर्थ दिखते हैँ।

योँ तो सी० बी० एस० ई० की ओर सुस्पष्ट कर दिया गया है कि यदि किसी छात्र-छात्रा मे अपनी उत्तरपुस्तिका के परीक्षण और मूल्यांकन को लेकर संतोष नहीँ है तो वह अपनी उत्तरपुस्तिका की स्कैण्ड प्रतिलिपि देख सकता है, जिसके लिए ₹१०० शुल्क है; असंतुष्टि की दशा मे वह विद्यार्थी किसी प्रश्न-विशेष का पुनर्परीक्षण कराना चाहे तो उसे ₹२५ अलग से देने होँगे।

सी० बी० एस० ई० ने सुस्पष्ट कर दिया था कि वर्ष २०२६ से प्रारम्भ हो रही दो नयी बोर्ड-परीक्षाप्रणालियोँ के अन्तर्गत दसवीँ कक्षा के विद्यार्थियोँ के लिए पहली बोर्ड-परीक्षा देना अनिवार्य होगा। यदि कोई विद्यार्थी पहली परीक्षा मे सम्मिलित नहीँ होता है तो उसे दूसरी बोर्ड-परीक्षा मे बैठने की अनुमति नहीँ दी जायेगी।

इस समय बारहवीँ परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओँ को देखने और उनमे पायी जानेवाली परीक्षण और अंक-विसंगति को देखकर घमासान मचा हुआ है। जहाँ विद्यार्थी अपने भविष्य के प्रति आशंकित हैँ, वहीँ अभिभावक और माँ-बाप के चेहरोँ पर दुश्चिन्ता की लकीरेँ दिख रही हैँ। इस वर्ष बारहवीँ का परिणाम पिछले ७ वर्ष मे सबसे कम रहा है। वर्ष २०२५ मे ८८.३९ प्रतिशत था, जो इस वर्ष ८५.२० प्रतिशत पर सरक चुका है। बारहवीँ मे विद्यार्थी ७५ प्रतिशत से कम अंक पाये हैँ।इसका सीधा असर उन विद्यार्थियोँ पर पड़ता दिख रहा है, जिन्हेँ जे० ई० की मुख्य परीक्षा के लिए पात्रता चाहिए, जोकि ७५ प्रतिशत है। यदि सी० बी० एस० ई० की घोषणा पर विश्वास करेँ तो इस वर्ष बारहवीँ की परीक्षा मे कुल १७ लाख ८० हज़ार ३ सौ ६५ विद्यार्थी सम्मिलित हुए थे, जिनमे से १५ लाख ७ हज़ार १०९ विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए हैँ। उसके बाद उत्तरपुस्तिकाओँ के पुनर्मूल्यांकन और स्कैन उत्तरपुस्तिका-प्रतिलिपि के लिए सम्बन्धित पोर्टल खोला गया था तब शिकायत की एक प्रकार से बाढ़ आ गयी। शुरू के तीन घण्टोँ मे ही १ लाख २६ हज़ार ऐसे आवेदक दिखे थे, जिन्होँने उत्तरपुस्तिकाओँ की स्कैन की गयी प्रतिलिपि और अंक-सत्यापन कराने का अनुरोध कर दिया था। अब तक बारहवीँ कक्षा के कुल ४ लाख ४ हज़ार ३ सौ १९ विद्यार्थियोँ ने अपनी उत्तरपुस्तिका की स्कैन करायी गयी प्रतिलिपि के लिए आवेदन किया है। इसका मतलब है कि हर चौथा विद्यार्थी केन्द्रीय बोर्ड की परीक्षाप्रणाली की विश्वसनीयता को चुनौती देता हुआ दिख रहा है। सी० बी० एस० ई० ने ओ० एस० एम० की प्रणाली पर किये जा रहे प्रश्नो के बीच ‘क्रमिक मूल्यांकन’ (स्टेप मार्किंग) को समझाते हुए, यह बताने की कोशिश की है कि नौ स्टेप कौन-कौनसे हैँ। ———————————————–

क्या है, ‘क्रमिक मूल्यांकन’ (स्टेप मार्किंग)?

 ओ० एस० एम०-प्रणाली के अन्तर्गत बोर्ड ने उत्तरपुस्तिका-परीक्षण के लिए जो व्यवस्था की है, वह नौ प्रकार की प्रक्रियाओँ से गुज़रती है, जिसे 'क्रमिक मूल्यांकन' (स्टेप मार्किंग) कहा गया है।

पहला– एकत्रीकरण एवं सुरक्षा :– परीक्षा होने के पश्चात् सबसे पहले उत्तरपर्णी (आँसर-शीट) को एक स्थान पर एकत्र किया जाता है। बाह्य विशेषज्ञ का उत्तरपर्णी की सुरक्षा करने का दायित्व होता है, ताकि पहचान की गोपनीयता बनी रह सके।

दूसरा– स्कैनिंग :– उत्तरपर्णियोँ को एक स्थान पर सुरक्षित करने के बाद उन्हेँ सम्बन्धित एजेंसी-द्वारा उच्च गुणवत्तावाले स्कैनर से स्कैन किया जाता है।

तीसरा– गुणवत्ता-परीक्षण (प्रथम स्तर) :– एजेंसी के दल-द्वारा स्कैन की गयी उत्तरपुस्तिकाओँ का प्रथम स्तर पर गुणवत्ता का परीक्षण किया जाता है। यदि गुणवत्ता संतोषजनक नहीँ दिखती तो उत्तरपुस्तिकाओँ को पुन: स्कैन किया जाता है।

चार– क्षेत्रोँ मे भेजना :– गोपनीयता बनाये रखने के लिए स्कैन की गयी उत्तरपुस्तिकाएँ डिस्पैच करके अलग-अलग क्षेत्र मे भेजी जाती हैँ; यद्यपि उस क्षेत्र मे नहीँ भेजी जातीँ, जहाँ उस प्रश्नपत्र का सेट पेपर मे आया था।

पाँच– सुरक्षित पहुँच :– सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मूल्यांकन-केन्द्रोँ के स्टैटिक आइ० पी० को ‘ह्वाइटलिस्ट’ किया जाता है, जिससेकि अध्यापकोँ के व्यवस्थान्तर्गत (सिस्टम) सेट के अनुसार उत्तरपुस्तिका को भेजा जा सके।

छ: – सेट के अनुसार (सेट-वाइज) आवण्टन :– उत्तरपर्णी को सेट के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है और मूल्यांककोँ (इह्वैल्यूएटर्स) को आवण्टित किया जाता है।

सात– शिक्षकोँ-द्वारा मूल्यांकन :– मूल्यांकनकर्त्ता कम्प्यूटर-सिस्टम पर उत्तरपुस्तिका का परीक्षण और उनका मूल्यांकन करते हैँ।

आठ– मूल्यांकनकर्त्ताओँ-द्वारा गुणवत्ता-परीक्षण :– यहाँ स्कैन की गयी उत्तरपुस्तिकाओँ की दूसरी बार गुणवत्ता का परीक्षण किया जाता है। यदि शिक्षक को गुणवत्ता का स्तर उपयुक्त नहीँ लगता तो मूल्यांकनकर्त्ता अपनी टिप्पणी लगाकर, उस उत्तरपर्णी को अस्वीकार कर सकते हैँ। मूल्यांकन से पहले सी० बी० एस० ई०-द्वारा सुधारात्मक गतिविधि की जाती है।

नौ– अन्तिम प्रति-परीक्षण (फाइनल क्रॉस-चेकिंग) :– उत्तरपुस्तिकाओँ के परीक्षण-कार्य पूर्ण होने के पश्चात् सहायक प्रधान परीक्षक और/वा प्रधान परीक्षक-द्वारा उत्तरपर्णी का अन्तिम प्रति-परीक्षण किया जाता है।

जिस तरह से परिणाम को देखकर लाखोँ की संख्या मे छात्र-छात्राएँ आक्रोशित और उद्विग्न हैँ; माँ-बाप और अभिभावक चिन्तित हैँ, उससे सुस्पष्ट हो जाता है कि उक्त नौवोँ क्रमिक मूल्यांकन-चरण की उपेक्षा करते हुए, परिणाम घोषित किया गया है।

यदि वर्ष २०२५ के आँकड़ोँ को सामने रखकर तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो ज्ञात होगा है कि वर्ष २०२५ मे मात्र १ लाख ३१ हज़ार विद्यार्थियोँ ने उत्तरपुस्तिका के पुनर्परीक्षण और अंक-सत्यापन के लिए आवेदन किया था; तब २ लाख ८२ हज़ार उत्तरपुस्तिकाओँ को चुनौती दी गयी थी। अब यह संख्या ४ लाख से अधिक हो चुकी है और ११ लाख ३१ हज़ार ९ सौ ६१ उत्तरपुस्तिकाओँ तक पहुँच गयी है; २२.८५ प्रतिशत विद्यार्थियोँ ने आवेदन किये हैँ। निष्कर्षत:, किसी बोर्ड की परीक्षा मे इतने बड़े पैमाने पर इससे पहले धाँधली कभी नहीँ करायी गयी थी।

(क्रमश:)