‘कोएम्प्ट’ बदनाम थी, फिर सी० बी० एस० ई० ने ठीका क्योँ दिया?

सी० बी० एस० ई०-परीक्षाकाण्ड– तीन

सी० बी० एस० ई० की नाकामी थमने का नाम नहीँ ले रही है; कारण कि सामने इतने प्रमाण आ चुके हैँ कि उस बोर्ड के अधिकारियोँ के मुँह पर सरकारी ताले लग गये हैँ वा फिर लगा दिये गये हैँ। एक सच को छिपाने के लिए कई-कई झूठ बोले जा रहे हैँ। जैसाकि हमारा पाठकवर्ग जानता है कि जो परीक्षाएँ व्यापक स्तर पर करायी जाती हैँ, उन्हेँ शुचितापूर्वक सम्पन्न कराने के लिए सम्बन्धित एजेंसियोँ को किराये पर लिया जाता है, जिन्हेँ ठीका दे दिया जाता है। सी० बी० एस० ई०-परीक्षा मे भी ऐसा ही किया गया था; परन्तु वह खरी नहीँ उतरी।

उपर्युक्त बोर्ड-द्वारा अपनी देशस्तरीय परीक्षा कराने के लिए 'कोएम्प्ट' नामक एजेंसी से सम्पर्क साधा गया था; परन्तु उसके चाल-चरित्र-चेहरे पर विचार नहीँ किया गया था; उसकी पृष्ठभूमि खँगाली नहीँ गयी थी। ऐसा इसलिए पहले वही एजेंसी 'ग्लोबरेना' के नाम से वर्ष २०१९ मे यही कारनामा कर चुकी थी। इसे ही कहा जाता है– नाम बदला; पर नीयत नहीँ; फ़ित्रत वही। उस बदनाम एजेंसी के भरोसे १८ लाख ५ हज़ार विद्यार्थियोँ का भविष्य दाँव पर लगा दिया गया। हम इसे ग़लती वा भूल नहीँ कहेँगे, बल्कि सोची-समझी साज़िश कहेँगे।

अब यहाँ कई तरह के प्रश्न उत्पन्न हो रहे हैँ :–
● कोएम्प्ट को सी० बी० एस० ई० का ठीका क्या सोचकर दिया गया?
● ठीका किसने दिया?
● ठीका किसके कहने पर दिया गया?
● ठीका किस नियम के अन्तर्गत दिया गया?
● जिस कोएम्प्ट एजेंसी को ठीका दिया गया था, वह 'ग्लोबरेना' नाम से परीक्षाकाण्ड कर चुकी है; क्या सी० बी० एस० ई० को इसकी जानकारी नहीँ थी और नहीँ थी तो क्योँ नहीँ थी?
● कोएम्प्ट-प्रबन्धन और मोदी ऐण्ड कम्पनी के बीच आख़िर कौन-सा सम्बन्ध था, जो अन्य ठीकेदारी-निविदाओँ को ठुकुराकर अन्तत:, बदनाम एजेंसी 'कोएम्प्ट' को ठीका दे दिया गया?

इसे लेकर सी० बी० एस० ई० की ओर से कहा गया है कि निर्धारित प्रक्रियाओँ को पूर्ण करने के बाद ही बोलीदाता को ठीका प्रदान किया गया था। एजेंसी को ठीका देने मे सामान्य वित्तीय नियमो का पालन किया गया और चयन-प्रक्रिया मे किसी प्रकार की अनियमितता नहीँ हुई। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि निविदा, मूल्यांकन एवं चयन से जुड़ी समस्त प्रक्रियाएँ शासकीय क्रय मानकोँ के अनुरूप पूरी की गयी। समूची क्रय-प्रक्रिया सरकार के ई०-प्रोक्योरमेण्ट प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से संचालित की गयी, ताकि सार्वजनिक व्यय मे पारदर्शिता, प्रतिस्पर्द्धा और उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जा सके।

अब प्रश्न है, कथित बोर्ड की ओर से इतनी सावधानी बरतने के बाद भी उसका 'सतीत्व' कैसे भंग हो गया? क्या केन्द्र-सरकार इस समूचे घोटाले के वास्तविक अपराधियोँ को सामने लाने के लिए अतिशीघ्र एक स्वतन्त्र न्यायिक जाँच और एस० आइ० टी० के गठन का आदेश करेगी वा फिर देश की न्यायपालिका स्वत: संज्ञान लेकर समुचित कार्यवाही करेगी?

अब सी० बी० एस० ई० की ग़लत नीयत और नीतियोँ के विरुद्ध विद्यार्थी ललकारने की स्थिति मे आ चुके हैँ। वे तीन स्तर पर बोर्ड के मुश्किलात बढ़ा चुके हैँ :–
पहला– विद्यार्थी अपने अंक-सत्यापन करा रहे हैँ, जिससेकि प्राप्तांक और 'डेटा-एण्ट्री' की ग़लती पकड़ी जाये।
दूसरा– विद्यार्थी अपनी स्कैन करायी गयी उत्तर-पुस्तिका की माँग कर रहे हैँ, जिससेकि वे स्वयं देखेँ कि कहीँ कोई प्रश्न बिना परीक्षण वा मूल्यांकन के छोड़ तो नहीँ दिया गया है।
तीसरा– विद्यार्थी पुनर्मूल्यांकन-पद्धति के द्वारा आपत्तिजनक प्रश्नोत्तर/प्रश्नोत्तरोँ का/के पुनर्परीक्षण चाहते हैँ।

सी० बी० एस० ई० की इसी लापरवाही वा फिर यह कहना सच होगा कि सोची-समझी साज़िश के अन्तर्गत जो कुकृत्य किये और कराये गये हैँ, उसके फलस्वरूप कई प्रश्न मुँह बाये खड़े हो चुके हैँ, जो हमारी लाखोँ छात्र-छात्राओँ का प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैँ। वे प्रश्न अब चीख़ रहे हैँ :–
● आपत्ति करने और पुनर्परीक्षण के लिए जो उपयुक्त शुल्क निर्धारित किये गये थे, उन्हेँ पोर्टल पर बढ़ा-चढ़ाकर क्योँ दिखाया जा रहा था?
● सी० बी० एस० ई० ने इतनी धुँधली स्कैन कॉपी कैसे करायी है, जबकि उच्च गुणवत्तायुक्त स्कैनर और उसके परिणाम की घोषणा की गयी है?
● अस्पष्ट (ब्लर) उत्तर-पुस्तिकाओँ का परीक्षण कौन-सा चश्मा लगवाकर कराया गया था?
● विद्यार्थियोँ की उत्तरपर्णी (आँसरशीट) की अदला-बदली कैसे हो गयी थी? कई उत्तरपुस्तिकाओँ मे से पन्ने कैसे ग़ायब हो गये थे?
● जिन परीक्षार्थियोँ ने प्रश्नो के उपयुक्त उत्तर दिये थे, उनके अंक क्योँ काटे गये थे?
● जिन विद्यार्थियोँ ने जितने विषयोँ की उत्तरपर्णी पाने के लिए आवेदन किये थे, उन्हेँ उतने क्योँ नहीँ दिये गये?

कई छात्र-छात्राओँ की शिकायत मह्ज़ 'शिकायत' बनकर रह गयी है कि उनके बैंक-खाते से रुपये काट लिये गये थे; परन्तु उनका आवेदनपत्र जमा ही नहीँ हुआ। हमारे विद्यार्थियोँ की यह भी शिकायत रही कि सी० बी० एस० ई० की वेबसाइट पर पुनर्मूल्यांकन का कोई सीधा लिंक तक नहीँ दिया गया था, जिसके कारण उन्हेँ 'मुक्त मीडिया' (सोसल मीडिया) X (एक्स/ट्वीटर हैण्डिल) और अन्य समूह से लिंक की व्यवस्था करनी पड़ी थी। इससे विद्यार्थियोँ, माँ-बाप और अभिभावकोँ को अत्यन्त कठिन और तनाव के दौर से गुज़रना पड़ा है।

एक फ़िल्मी गीत भी है, जो बहुत चर्चित रहा है :– "सच्चाई छुप नहीँ सकती, बनावट के वसूलोँ से कि ख़ुशबू आ नहीँ सकती, कभी काग़ज़ के फूलोँ से।" इस गीत का निष्कर्ष पूरी तरह से सी० बी० एस० ई० बोर्ड पर लागू होता है। अब बोर्ड की व्यवस्था मे छेद हो चुका है, जो गहरा और व्यापक रूप ले रहा है। हमने जब सच को सामने लाने के लिए उन अध्यापक-अध्यापिकाओँ से सम्पर्क किये, जो परीक्षक-परीक्षिका की भूमिका मे थीँ, तब ज्ञात हुआ कि परीक्षक-परीक्षिकाओँ ने जानबूझकर निम्न गुणवत्तावाली उत्तरपुस्तिकाओँ का परीक्षण किया था, यद्यपि उन धुँधली उत्तरपुस्तिकाओँ के परीक्षण करने से परीक्षक मना भी कर सकते थे। वैसा करने पर धुँधली दिख रहीँ उत्तरपुस्तिकाओँ का फिर से स्कैन कराकर उनके पास भेजा जा सकता था। उन अध्यापक-अध्यापिकाओँ का कहना था कि उत्तरपुस्तिका-परीक्षण की प्रक्रिया विलम्ब मे शुरू करायी गयी थी। पहले 'फ़िज़िकल इग्ज़ामिन' मे परीक्षा समाप्त होने के १० दिनो के भीतर शिक्षकोँ को परीक्षण के लिये बुला लिया जाता था; लेकिन इस बार उन्हेँ महीनो-बाद बुलाया गया था, जिसका परिणाम रहा कि शिक्षकोँ के पास कम समय मे अधिक उत्तरपुस्तिकाएँ परीक्षण करने का दबाव था। इसके बाद रही-सही कसर 'स्लो सिस्टम' ने पूरी कर दी। उन्हेँ १२ से १५ उत्तरपुस्तिकाओँ का परीक्षण करना पड़ा था।

नयी परीक्षण-प्रणाली 'ओ० एस० एम० विद्यार्थियोँ के लिए घातक सिद्ध हुई है; क्योँकि इससे विद्यार्थियोँ की उत्तरपुस्तिकाओँ की प्रति-परीक्षण (क्रॉस-इग्ज़ामिन) का तरीक़ा भी अब पहले-जैसा नहीँ रहा। पहले परीक्षक उत्तरपुस्तिका का परीक्षण करने के बाद अपने सहयोगी से पुन: परीक्षण करा लेते थे, जिससेकि न कोई प्रश्न छूटे और न ही अंक। इससे कुल प्राप्तांक भी ठोस नज़र आता था। अब जो यह नयी प्रणाली लागू की गयी है, उसमे प्रति-परीक्षण की प्रक्रिया कम्प्यूटर पर आधारित है। उस पर तुर्रा यह कि कम्प्यूटर ही निर्धारित करता है कि किस उत्तरपुस्तिका का प्रति-परीक्षण होना चाहिए।

इससे ज़ाहिर होता है कि देश का शिक्षा-मन्त्रालय और सी० बी० एस० ई० अपने चारित्रिक और संघटात्मक अपराध को छिपाने की नाकाम कोशिश करता आ रहा है। 

(क्रमश:)