जहाँ राम हैं, वहीं अयोध्या है

वन की ओर बढ़ते रथ के पहिए केवल धूल नहीं उड़ा रहे थे, वे इतिहास की दिशा बदल रहे थे। अयोध्या पीछे छूट रही थी और सामने था अनिश्चितताओं से भरा वन। किन्तु सबसे बड़ा वन तो मनुष्य के भीतर होता है—जहाँ स्मृतियाँ, मोह, प्रेम, कर्तव्य और विरह एक साथ निवास करते हैं।

उस दिन आर्य सुमन्त्र केवल रथ नहीं चला रहे थे, वे तीन हृदयों के बीच चल रहे थे—दशरथ का विह्वल हृदय, राम का दृढ़ हृदय और सीता का समर्पित हृदय।

महाराज दशरथ की आज्ञा उनके कानों में गूँज रही थी—

“सुमन्त्र! यदि राम न लौटें तो कम से कम जानकी को लौटा लाना।”

यह आदेश नहीं, एक असहाय पिता की अंतिम प्रार्थना थी।

सुमन्त्र जानते थे कि राम लौटने वाले नहीं हैं। जो पुत्र पिता के एक वचन के लिए राज्य त्याग सकता है, वह संसार की किसी प्रार्थना से विचलित नहीं होगा। फिर भी उनके मन में एक आशा थी—शायद सीता लौट जाएँ।

उन्हें वन का कष्ट समझाया जा सकता है।

उन्हें अयोध्या का सुख याद दिलाया जा सकता है।

उन्हें वृद्ध सास-ससुर का दुःख दिखाया जा सकता है।

इन्हीं विचारों के साथ उन्होंने सीता से निवेदन किया।

“देवि! महाराज की आज्ञा है। वन का मार्ग अत्यन्त कठिन है। काँटे हैं, हिंसक पशु हैं, वर्षा है, तपती धूप है। आप अयोध्या लौट चलिए।”

कुछ क्षण तक मौन छाया रहा।

फिर सीता ने धीरे से मुख उठाया।

उनकी आँखों में आँसू नहीं थे। वहाँ एक अद्भुत शान्ति थी, जैसे कोई नदी अपने समुद्र का मार्ग जानती हो।

“तात! आप मेरे हितैषी हैं। मेरे पिताजी और ससुरजी के समान हैं। आपको उत्तर देना भी मेरे लिए अनुचित है।”

वे कुछ क्षण रुकीं।

“किन्तु आज मैं दुःखातुर हूँ। यदि कुछ कह दूँ तो बुरा न मानिएगा।”

सुमन्त्र का हृदय काँप उठा।

“कहिए पुत्री।”

सीता ने क्षितिज की ओर देखते हुए कहा—

“क्या कभी किसी ने शरीर से अलग होकर उसकी छाया को जीवित रहते देखा है?”

सुमन्त्र मौन रहे।

“क्या सूर्य की प्रभा सूर्य को छोड़कर कहीं और जा सकती है?”

“नहीं।”

“क्या चन्द्रमा से अलग होकर चाँदनी का कोई अस्तित्व है?”

“नहीं।”

“तो फिर मैं राम को छोड़कर कैसे रह सकती हूँ?”

यह केवल एक उत्तर नहीं था।

यह भारतीय दर्शन का सार था।

आत्मा अपने सत्य से अलग नहीं हो सकती।

जिस प्रकार नदी समुद्र से मिलने को व्याकुल रहती है, उसी प्रकार प्रेम अपने केन्द्र की ओर प्रवाहित होता है।


वन की ओर बढ़ते हुए सीता के मन में स्मृतियाँ उठने लगीं।

मिथिला…

वह विशाल राजप्रासाद…

माता सुनयना का स्नेह…

राजर्षि जनक का ज्ञान…

बाल्यकाल की हँसी…

सब कुछ जैसे उनके सामने जीवित हो उठा।

सुमन्त्र ने फिर कहा—

“पुत्री! तुम्हारे पिता जनक हैं। उनके समान वैभव और ज्ञान संसार में दुर्लभ है।”

सीता मुस्कराईं।

“हाँ तात! मैंने वह वैभव देखा है।”

“मैंने देखा है कि बड़े-बड़े राजा पिता के चरणों में प्रणाम करते थे।”

“मैंने देखा है कि सम्पूर्ण मिथिला उनके ज्ञान का सम्मान करती थी।”

फिर उनका स्वर गंभीर हो गया।

“किन्तु तात, यदि किसी उपवन में संसार के सभी पुष्प हों और सुगन्ध न हो, तो क्या वह उपवन प्रिय लगेगा?”

सुमन्त्र ने कोई उत्तर नहीं दिया।

“मेरे लिए राम वही सुगन्ध हैं।”

“उनके बिना मिथिला भी केवल भवनों का समूह है।”

“उनके साथ वन भी वैकुण्ठ है।”


प्रेम क्या है?

यह प्रश्न उस दिन केवल सुमन्त्र के सामने नहीं था, स्वयं सीता के भीतर भी था।

क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है?

क्या प्रेम केवल आकर्षण है?

क्या प्रेम अधिकार है?

नहीं।

प्रेम वह है जिसमें ‘मैं’ धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

जहाँ दो अस्तित्व मिलकर एक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।

राम और सीता का संबंध पति-पत्नी का अवश्य था, किन्तु उससे कहीं अधिक वह दो आत्माओं का संवाद था।

इसलिए सीता के लिए वनवास कोई त्याग नहीं था।

त्याग तो तब होता जब वे राम से अलग होतीं।

वन तो केवल स्थान परिवर्तन था।

वियोग नहीं।


रात्रि होने लगी थी।

आकाश तारों से भर गया था।

राम दूर खड़े वृक्षों की ओर देख रहे थे।

उनके भीतर भी एक गहरा संघर्ष था।

वे जानते थे कि वन का जीवन कठिन होगा।

वे जानते थे कि सीता को कष्ट होगा।

वे चाहते तो उन्हें रोक सकते थे।

किन्तु उन्होंने कभी सीता को अपनी इच्छा का विषय नहीं समझा।

उन्होंने उन्हें अपने जीवन का सहभागी माना।

यही प्रेम का सर्वोच्च रूप है।

जहाँ अधिकार समाप्त हो जाता है और सम्मान प्रारम्भ होता है।

राम ने सोचा—

“कितना विचित्र है प्रेम।”

“यह किसी को बाँधता नहीं।”

“फिर भी संसार का सबसे गहरा बंधन बन जाता है।”


उधर अयोध्या में महाराज दशरथ की स्थिति दिन-प्रतिदिन विकट होती जा रही थी।

उन्हें न भोजन में रुचि थी, न निद्रा में।

उनकी आँखों के सामने बार-बार बालक राम का मुख आ जाता।

वह राम जिसे उन्होंने गोद में खिलाया था।

वह राम जिसकी हँसी से राजमहल गूँज उठता था।

आज वही राम वन में था।

और उनके साथ सीता भी।

दशरथ का दुःख केवल पुत्र-वियोग का नहीं था।

उन्हें यह भी पीड़ा थी कि एक राजकुमारी, जिसने कभी दुःख नहीं देखा, आज वन के कष्ट सह रही है।

वे सोचते—

“मैंने क्या किया?”

“एक वचन निभाने के लिए क्या मैंने सब कुछ खो दिया?”

परन्तु अगले ही क्षण उन्हें स्मरण होता—

धर्म कभी सस्ता नहीं होता।

उसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

और जो जितना बड़ा होता है, उससे उतना ही बड़ा मूल्य माँगा जाता है।


उधर वन में जीवन प्रारम्भ हो चुका था।

पत्तों की शय्या।

फल-मूल का आहार।

नदी का जल।

खुले आकाश की छत।

किन्तु आश्चर्य यह था कि सीता को कोई शिकायत नहीं थी।

एक दिन लक्ष्मण ने पूछा—

“भाभी! क्या आपको अयोध्या की याद नहीं आती?”

सीता मुस्कराईं।

“आती है।”

“बहुत आती है।”

“माता कौशल्या की याद आती है।”

“उर्मिला की याद आती है।”

“महल की नहीं, लोगों की याद आती है।”

फिर कुछ क्षण रुककर बोलीं—

“किन्तु स्मृति और मोह में अंतर होता है।”

“स्मृति प्रेम है।”

“मोह बंधन है।”

“मैं अयोध्या को प्रेम करती हूँ, पर उससे बँधी नहीं हूँ।”

लक्ष्मण विस्मित रह गए।


समय बीतता गया।

वन के वृक्ष अब परिचित लगने लगे।

नदियाँ अपनी भाषा बोलने लगीं।

पक्षियों का संगीत घर जैसा लगने लगा।

सीता ने अनुभव किया कि मनुष्य का वास्तविक घर कोई भवन नहीं होता।

घर वह स्थान है जहाँ उसका प्रेम निवास करता है।

इस संसार में अधिकांश दुःख इसलिए हैं क्योंकि हम घर को भवन समझ लेते हैं।

जबकि घर तो हृदय में होता है।


एक दिन नदी के तट पर बैठी सीता जलधारा को देख रही थीं।

जल बहता जा रहा था।

उन्होंने सोचा—

“क्या जीवन भी ऐसा ही नहीं है?”

“जो रुक गया, वह सड़ गया।”

“जो बहता रहा, वही निर्मल रहा।”

फिर उन्हें लगा—

“वियोग भी तो नदी की तरह है।”

“वह भीतर के स्थिर जल को बहा देता है।”

“वह हमें अपने भीतर झाँकना सिखाता है।”

मनुष्य जब तक सब कुछ पा लेता है, तब तक वह स्वयं को नहीं जानता।

वियोग उसे अपने भीतर ले जाता है।

और भीतर ही सत्य मिलता है।


सुमन्त्र जब अयोध्या लौटे तो वे पहले जैसे नहीं रहे थे।

उन्होंने केवल राम और सीता को वन में नहीं छोड़ा था।

उन्होंने वहाँ अपने अनेक भ्रम भी छोड़ दिए थे।

उन्होंने देखा था कि प्रेम सुख का नाम नहीं है।

प्रेम सत्य का नाम है।

उन्होंने देखा था कि त्याग दुःख नहीं है।

त्याग आत्मा की स्वतंत्रता है।

उन्होंने देखा था कि स्त्री केवल पति की अनुयायी नहीं होती।

वह धर्मयात्रा की सहयात्री होती है।

जब उन्होंने दशरथ को सीता के शब्द सुनाए—

“जहाँ राम हैं, वहीं मेरा स्वर्ग है।”

तब महाराज फूट-फूटकर रो पड़े।

किन्तु उन आँसुओं में केवल दुःख नहीं था।

वहाँ गर्व भी था।

उन्हें लगा कि राम अकेले वन नहीं गए हैं।

धर्म स्वयं उनके साथ गया है।


वर्षों बाद भी यह प्रश्न बना रहेगा—

क्या सीता का निर्णय केवल पत्नी धर्म था?

नहीं।

उसके भीतर एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है।

सीता का राम के साथ जाना वास्तव में आत्मा का सत्य के साथ चलना है।

जब आत्मा अपने सत्य को पहचान लेती है, तब उसे वन और महल में अंतर नहीं दिखाई देता।

सुख और दुःख में अंतर नहीं दिखाई देता।

लाभ और हानि में अंतर नहीं दिखाई देता।

वह केवल अपने ध्येय को देखती है।

और वही मुक्ति का मार्ग है।


वन की उस संध्या में कहा गया एक वाक्य आज भी युगों को प्रकाश देता है—

“छाया शरीर को छोड़कर कहाँ जा सकती है?”

यह केवल सीता का कथन नहीं।

यह प्रत्येक प्रेम का सत्य है।

यह प्रत्येक साधना का सत्य है।

यह प्रत्येक आत्मा का सत्य है।

क्योंकि जब प्रेम अपने शुद्धतम रूप में पहुँचता है, तब वहाँ दो नहीं रहते।

वहाँ केवल एक ही रहता है।

और उसी एकत्व का नाम है—

समर्पण।

और जहाँ समर्पण है, वहीं प्रेम है।

जहाँ प्रेम है, वहीं धर्म है।

जहाँ धर्म है, वहीं राम हैं।

और जहाँ राम हैं—

वहीं अयोध्या है।