धर्म की रक्षा के लिए दण्ड भी आवश्यक : सीता


वन का विस्तार जितना सुंदर था, उतना ही भयावह भी। एक दिन प्रातःकाल सीता आश्रम से कुछ दूर वनौषधियाँ एकत्र करने निकलीं। उनके साथ कुछ ऋषि-पत्नियाँ भी थीं। मार्ग में उन्हें जो दृश्य दिखाई दिया, उसने उनके अंतर्मन को झकझोर दिया।

कहीं यज्ञशाला की वेदी टूटी पड़ी थी। कहीं अग्निकुण्ड में रक्त के धब्बे दिखाई दे रहे थे। किसी वृक्ष से तपस्वी के कमण्डलु के अवशेष लटक रहे थे। दूर-दूर तक अस्थियाँ बिखरी थीं।

वायु में धुएँ की नहीं, भय की गन्ध थी।

वन का प्रत्येक पत्ता मानो किसी अनकहे अत्याचार का साक्षी था।

एक वृद्ध तपस्विनी फूट-फूटकर रो रही थी।

सीता उसके समीप बैठ गईं।

“माता! यह सब किसने किया?”

वृद्धा ने काँपते हुए उत्तर दिया—

“पुत्री…

रात्रि में फिर वे आ गए थे।

यज्ञ की वेदी तोड़ दी।

ऋषियों को पीटा।

दो ब्रह्मचारियों को उठा ले गए।

जो विरोध करता है, उसका वध कर देते हैं।

अब तो वन में संध्या होते ही कोई दीपक तक नहीं जलाता।”

सीता की आँखों में करुणा उमड़ पड़ी।

परन्तु उस करुणा के भीतर पहली बार अग्नि भी जल उठी।


संध्या को जब श्रीराम लौटे तो उन्होंने देखा कि आज सीता अत्यन्त मौन हैं।

राम ने स्नेहपूर्वक पूछा—

“देवि!

आज तुम्हारा मौन कुछ और कह रहा है।

क्या वन ने तुम्हें कोई नया रहस्य बताया है?”

सीता ने धीरे से कहा—

“हाँ प्रभु।

आज वन ने मुझे अपना दुःख सुनाया है।”

राम ध्यानपूर्वक सुनने लगे।

कुछ क्षण बाद सीता का स्वर गम्भीर हो गया।

“प्रभु!

मैंने आज तपस्वियों की आँखों में भय देखा।

मैंने उन बच्चों को देखा जो मन्त्र नहीं, चीखें याद कर रहे हैं।

मैंने उन माताओं को देखा जो पुत्रों को वेद नहीं, छिपना सिखा रही हैं।

क्या यही धर्म है?”

राम मौन रहे।

सीता आगे बोलीं—

“करुणा का अर्थ अत्याचार सहना नहीं होता।

जहाँ निर्दोष काँप रहे हों,

वहाँ केवल क्षमा की बात करना भी अधर्म हो जाता है।”


लक्ष्मण ने आश्चर्य से सीता की ओर देखा।

उन्होंने पहली बार उनके स्वर में ऐसा तेज अनुभव किया।

सीता उठीं।

उनकी दृष्टि दूर पर्वतों की ओर थी।

“आर्यपुत्र!

मैं जनक की पुत्री हूँ।

विदेह की भूमि पर मेरा पालन हुआ है।

वहाँ मुझे केवल वेद नहीं पढ़ाए गए।

मुझे धनुष की प्रत्यंचा का स्वर भी सुनाया गया।

मुझे यह भी सिखाया गया कि शस्त्र का उद्देश्य विजय नहीं,

निर्बलों की रक्षा है।

जो तलवार अहंकार के लिए उठे,

वह पाप है।

किन्तु जो तलवार किसी असहाय की रक्षा के लिए उठे,

वह स्वयं यज्ञ है।”

लक्ष्मण विस्मित रह गए।

“माँ!

क्या आपको शस्त्रविद्या का भी ज्ञान है?”

सीता मुस्कराईं।

“राजकुल की कन्या यदि केवल पुष्प पहचानती हो और अस्त्र नहीं,

तो राज्य की रक्षा कौन करेगा?

स्त्री केवल करुणा नहीं है।

समय आने पर वही दुर्गा भी होती है।

किन्तु उसका शस्त्र क्रोध से नहीं,

धर्म से संचालित होता है।”


रात्रि गहरी हो चुकी थी।

आकाश में असंख्य नक्षत्र चमक रहे थे।

सीता ने राम की ओर देखा।

उनकी आँखों में आज करुणा और तेज दोनों साथ-साथ थे।

“प्रभु!

आज मैं आपसे एक प्रार्थना नहीं,

एक धर्मयाचना करने आई हूँ।”

राम ने शांत स्वर में कहा—

“कहो देवी।”

सीता बोलीं—

“आपने पिता की आज्ञा के लिए राज्य छोड़ दिया।

यह त्याग था।

किन्तु अब समय त्याग से आगे बढ़ने का है।

अब समय रक्षा का है।

जिस वन में ऋषि भयभीत हों,

जहाँ स्त्रियाँ असुरक्षित हों,

जहाँ यज्ञ ध्वस्त किए जा रहे हों,

जहाँ बालकों की हँसी छिन गई हो—

उस वन में केवल तप पर्याप्त नहीं।

वहाँ धर्म की रक्षा के लिए दण्ड भी आवश्यक है।” राम स्थिर होकर सुनते रहे।

सीता का स्वर अब गर्जना बन चुका था— “यदि राजा केवल अपनी मर्यादा बचाए और प्रजा रोती रहे, तो वह मर्यादा नहीं, स्वार्थ है।

यदि क्षत्रिय अपने धनुष को केवल अलंकार बनाकर रखे, तो उसका जन्म व्यर्थ है और यदि धर्म केवल ग्रन्थों में सुरक्षित रहे, धरती पर नहीं— तो वह धर्म भी अधूरा है।”


कुछ क्षणों तक मौन छाया रहा। फिर सीता ने अत्यन्त मृदुल किन्तु अटल स्वर में कहा—

“आर्यपुत्र! मैंने राजमहल छोड़ा। मैंने वैभव छोड़ा। मैंने आभूषण छोड़े। मैंने सुख छोड़ा। यदि आवश्यकता पड़ी, तो मैं अपना जीवन भी छोड़ दूँगी। किन्तु मैं यह नहीं देख सकती कि मेरे सामने निर्दोषों का रक्त बहता रहे। मेरा जीवन मेरा नहीं है। जिस दिन मैंने आपके साथ वनगमन स्वीकार किया, उसी दिन मैंने अपने अस्तित्व को लोकमंगल के लिए समर्पित कर दिया। भूमि की पुत्री का जन्म अपने लिए नहीं होता।

धरती स्वयं सबका भार उठाती है। यदि उसकी पुत्री केवल अपने सुख की चिन्ता करे, तो वह भूमिजा कहलाने योग्य नहीं।”


राम की आँखें श्रद्धा से भर उठीं।

उन्होंने धीरे-धीरे कहा—

“देवि!

आज तुमने मुझे मेरा ही धर्म स्मरण कराया है।

मैं वन में पिता की आज्ञा का पालन करने आया था।

किन्तु अब समझ रहा हूँ—

ईश्वर ने मुझे यहाँ केवल वनवास के लिए नहीं भेजा।

उन्होंने मुझे अधर्म के अन्त के लिए भेजा है।

तुम्हारे वचन आज मेरे लिए वेदवाक्य हैं।”

राम ने अपना धनुष उठाया।

वन में एक अदृश्य स्पन्दन फैल गया।

मानो वृक्षों ने राहत की श्वास ली हो।

मानो नदियाँ प्रसन्न होकर बहने लगी हों।

मानो स्वयं पृथ्वी ने अपनी पुत्री की ओर देखकर कहा हो—

“आज तुमने केवल एक पत्नी का धर्म नहीं निभाया, अपितु धर्म की जननी होने का प्रमाण दिया है।”