सीता : ऋषियों के मध्य धर्म की अधिष्ठात्री

चित्रकूट में समय धीरे-धीरे बीत रहा था। अब वन के ऋषियों ने यह अनुभव करना प्रारम्भ कर दिया था कि श्रीराम के साथ केवल एक राजकुमार और एक राजकुलवधू नहीं आई है। उनके मध्य ऐसी स्त्री विराजमान है जिसके भीतर वेदों का मौन, उपनिषदों की गंभीरता और पृथ्वी की धैर्यपूर्ण करुणा एक साथ प्रवाहित हो रही है।

धीरे-धीरे आश्रमों की स्त्रियाँ, ब्रह्मचारिणियाँ, वृद्ध तपस्विनियाँ और यहाँ तक कि अनेक ऋषि भी धर्म के सूक्ष्म प्रश्न लेकर सीता के समीप आने लगे।

एक दिन महर्षि अत्रि, शरभंग, सुतीक्ष्ण और अनेक तपस्वी एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एकत्र थे।

श्रीराम और लक्ष्मण भी वहीं उपस्थित थे। महर्षि अत्रि ने अत्यन्त विनम्र स्वर में कहा—

“माते! हमने अनेक शास्त्र पढ़े हैं। वेदों का अध्ययन किया है। यज्ञ किए हैं। तप किया है। किन्तु एक प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।

धर्म का मूल क्या है?”

समस्त सभा मौन हो गई।

राम की दृष्टि सहज ही सीता की ओर उठी। सीता ने कुछ क्षण पृथ्वी की ओर देखा। अपनी अंजलि में थोड़ी मिट्टी उठाई। फिर अत्यन्त मन्द स्वर में बोलीं—

“ऋषिवर! यदि अनुमति हो तो मैं उत्तर देने का प्रयास करूँ।”

अत्रि मुस्कराए। “पुत्री! आज हम सुनने आए हैं।”


सीता ने मिट्टी को धीरे से भूमि पर बिखेर दिया।

“धर्म…

मनुष्य ने उसे बहुत कठिन बना दिया है।किन्तु प्रकृति ने उसे बहुत सरल रखा है। यह पृथ्वी किसी से उसका नाम नहीं पूछती। यह किसी का कुल नहीं पूछती। यह किसी का वर्ण नहीं पूछती। जो भी इसके ऊपर गिरता है, उसे यह धारण कर लेती है। इसीलिए पृथ्वी धर्म की प्रथम गुरु है।”

सभी ऋषि ध्यानमग्न होकर सुन रहे थे।

“धर्म वह नहीं, जिसे सिद्ध करने के लिए तर्क करना पड़े। धर्म वह है, जिसे देखकर पीड़ित के हृदय में विश्वास उत्पन्न हो जाए।”


एक युवा ऋषिकुमार ने प्रश्न किया— “माता!

क्या यज्ञ करना धर्म है?”

सीता ने उत्तर दिया— “यदि यज्ञ के धुएँ से किसी भूखे की रोटी छिन जाए, तो वह यज्ञ नहीं, अहंकार है।

यदि अग्नि में घृत अर्पित हो, किन्तु पड़ोस में कोई अश्रु पी रहा हो, तो देवता उस आहुति को स्वीकार नहीं करते।”


एक वृद्ध मुनि ने पूछा—

“तो क्या तपस्या व्यर्थ है?”

सीता ने मुस्कराकर कहा—

“नहीं। किन्तु तपस्या का फल यदि केवल तपस्वी को मिले, तो वह तप अधूरा है। सच्ची तपस्या वह है, जिसकी शीतलता दूसरे के जीवन तक पहुँचे।”


राम उस दिन पहली बार अनुभव कर रहे थे कि सीता केवल उनके जीवन की अर्धांगिनी नहीं हैं। वह धर्म की व्याख्याकार हैं। उन्हें लगा जैसे स्वयं वेद स्त्रीरूप धारण करके बोल रहे हों।


कुछ दिनों बाद वन की अनेक स्त्रियाँ सीता के पास आईं। उनके चेहरों पर भय था। राक्षसों का आतंक निरन्तर बढ़ रहा था।

एक युवती बोली— “माता!

हम कब तक डरते रहेंगे?” सीता ने उसे अपने पास बैठा लिया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—

“डर और सावधानी में अंतर होता है। जो सावधान है, वह जीवित रहता है। जो भयभीत है, वह जीते-जी मर जाता है।”


दूसरी स्त्री बोली— “हमारे पति युद्ध करते हैं।

हम क्या करें?”

सीता ने उत्तर दिया— “तुम्हारा कार्य उनसे छोटा नहीं है। जो योद्धा रणभूमि में लड़ता है, उसे शक्ति घर से मिलती है।

स्त्री यदि टूट जाए, तो समाज की रीढ़ टूट जाती है। पुरुष युद्ध जीतता है। स्त्री पीढ़ियाँ बनाती है।”


फिर उनका स्वर अत्यन्त तेजस्वी हो गया— “स्मरण रखो। स्त्री का अर्थ अबला नहीं है। स्त्री जीवन की प्रथम शिक्षिका है। यदि माता निर्भय होगी, तो सन्तान कभी दास नहीं बनेगी।”


अगले दिन सीता वन की कन्याओं को लेकर वन में निकलीं। उन्होंने एक छोटी सी बेल की ओर संकेत किया। “यह गुडूची है। ज्वर में प्राण बचाती है।”

थोड़ा आगे बढ़ीं। यह अपामार्ग है। विष उतरता है इससे।

एक वृक्ष की छाल छूते हुए बोलीं— यह अर्जुन है। हृदय को बल देता है।

मनुष्य वृक्ष काटने से पहले यदि उसका गुण जान ले, तो कुल्हाड़ी स्वयं रुक जाएगी।

वन की कन्याएँ विस्मय से उन्हें देख रही थीं।


अचानक दूर से एक बालक रोता हुआ आया।

“माता!

राक्षस फिर आए हैं।”

सीता का चेहरा बदल गया।

उनकी आँखों में अद्भुत तेज चमक उठा।

उन्होंने राम की ओर देखा। “आर्यपुत्र। अब समय आ गया है। करुणा की रक्षा के लिए शस्त्र उठाइए।

अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि अधर्म को खुली छूट दे दी जाए। अहिंसा निर्दोषों की रक्षा है और जहाँ रक्षा के लिए युद्ध आवश्यक हो, वहाँ युद्ध भी तपस्या है।” राम ने उसी क्षण अपना धनुष उठा लिया। वन के ऋषियों ने अनुभव किया— आज बोलने वाली जनकनन्दिनी नहीं थीं। आज स्वयं धर्म की अधिष्ठात्री भूमिसुता बोल रही थीं।