डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
चित्रकूट की वंदनीय भूमि से आगे बढ़ते हुए जब श्रीराम, लक्ष्मण और सीता महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे, तब संध्या अपने सुनहरे चरण धीरे-धीरे वनभूमि पर रख रही थी। पश्चिम दिशा रक्तिम थी। वन के ऊपर उड़ते सारस अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। मृगों के झुण्ड जलाशयों की ओर उतर रहे थे और दूर-दूर तक फैली हुई कुश और काश की श्वेत पंक्तियाँ मानो संध्या की आरती में दीपशिखाओं की तरह झिलमिला रही थीं।
महर्षि अत्रि ने आगे बढ़कर श्रीराम का आलिंगन किया।
उनकी दृष्टि फिर सीता पर पड़ी।
वे कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।
फिर भीतर जाकर देवी अनसूया से बोले—
“देवि! आज आश्रम में केवल अयोध्या की पुत्रवधू नहीं आई है। आज स्वयं पृथ्वी की सहनशीलता हमारे द्वार पर खड़ी है। तुम उसका स्वागत करो।”
अनसूया बाहर आईं।
उनके मुख पर तप था, किन्तु तप से कहीं अधिक वात्सल्य।
उन्होंने आगे बढ़कर सीता का हाथ पकड़ लिया।
वह स्पर्श साधारण नहीं था।
वह एक युग का दूसरे युग को स्पर्श था।
एक सिद्ध तपस्विनी का भविष्य की धर्ममूर्ति को स्वीकार करना था।
कुछ देर दोनों मौन रहीं।
फिर अनसूया ने पूछा—
“पुत्रि!
मैंने तुम्हारे त्याग की कथा सुनी है।
किन्तु मैं तुम्हारे त्याग की नहीं,
तुम्हारे मन की परीक्षा लेना चाहती हूँ।
बताओ—
तुम वन में क्यों आई हो?
क्या पति के प्रेम ने तुम्हें यहाँ तक लाया?
क्या राजधर्म ने?
या केवल लोकमर्यादा ने?”
आश्रम का वातावरण गंभीर हो गया।
ऋषि-कुमार भी अपने कार्य रोककर सुनने लगे।
सीता ने अत्यन्त शांत स्वर में कहा—
“माते!
यदि मैं केवल प्रेमवश आई होती,
तो प्रेम के क्षीण होते ही लौट जाती।
यदि केवल लोकमर्यादा के कारण आई होती,
तो लोक के भय के समाप्त होते ही लौट जाती।
यदि केवल राजधर्म के कारण आई होती,
तो राज्य के बदलते ही मेरा निर्णय बदल जाता।
किन्तु मैं इन तीनों से भी ऊपर एक कारण से आई हूँ—
धर्म के कारण।
जहाँ धर्म है,
वहीं मेरा स्थान है।”
अनसूया मुस्कराईं।
उन्होंने फिर पूछा—
“और यदि एक दिन धर्म और प्रेम में संघर्ष हो जाए?”
सीता ने बिना विलम्ब उत्तर दिया—
“सच्चा प्रेम कभी धर्म के विरुद्ध नहीं जाता।
जो प्रेम धर्म को तोड़ दे,
वह प्रेम नहीं—
आसक्ति है।
और जो धर्म प्रेम को नष्ट कर दे,
वह धर्म नहीं—
कठोरता है।
जहाँ दोनों एक-दूसरे को प्रकाशित करें,
वही सनातन मार्ग है।”
महर्षि अत्रि ने आँखें मूँद लीं।
वे मन ही मन बोले—
“आज उपनिषद् बोल रहे हैं।”
अनसूया अब सीता के और निकट आईं।
उन्होंने पूछा—
“पुत्रि!
संसार नारी को अनेक नाम देता है—
पुत्री,
पत्नी,
माता,
बहन।
पर मैं पूछती हूँ—
नारी स्वयं क्या है?”**
यह प्रश्न मानो सम्पूर्ण भारतीय दर्शन से पूछा गया था।
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर सीता बोली—
“माते!
नारी किसी सम्बन्ध का नाम नहीं है।
वह सम्बन्धों को जन्म देने वाली चेतना है।
वह केवल किसी की पत्नी नहीं।
वह कुलों को जोड़ने वाली सेतु है।
वह केवल माता नहीं।
वह भविष्य का संस्कार है।
वह केवल करुणा नहीं।
वह अन्याय के विरुद्ध उठने वाला प्रथम साहस भी है।
जहाँ पुरुष व्यवस्था बनाता है,
वहाँ नारी उसमें प्राण भरती है।
इसलिए नारी परिवार की शोभा नहीं—
समाज की आत्मा है।”
आश्रम में बैठे वृद्ध मुनि विस्मय से सीता को देखने लगे।
अनसूया ने कहा—
“यदि तुम्हारे सम्मुख कोई अधर्मी स्त्री आ जाए—
तो क्या तुम उसे भी उसी करुणा से देखोगी?”
सीता ने उत्तर दिया—
“हाँ।
क्योंकि पापी से पहले उसका दुःख दिखाई देना चाहिए।
जो भीतर से पूर्ण होता है,
वह अधर्म नहीं करता।
अधर्म प्रायः अभाव से जन्म लेता है—
ज्ञान के अभाव से,
प्रेम के अभाव से,
संस्कार के अभाव से।
इसलिए अपराध से पहले उसके कारण को समझना चाहिए।
किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि अधर्म को छोड़ दिया जाए।
करुणा अपराधी के प्रति हो सकती है,
अपराध के प्रति नहीं।”
अनसूया की आँखों में संतोष उतर आया।
अब अनसूया आश्रम के भीतर गईं।
वे दिव्य वस्त्र और आभूषण लेकर लौटीं।
उन्होंने उन्हें सीता के सम्मुख रख दिया।
फिर बोलीं—
“पुत्रि!
लोग समझते हैं कि मैं तुम्हें वस्त्र और आभूषण दे रही हूँ।
किन्तु यह बाहरी अलंकार नहीं हैं।
इनका अर्थ सुनो।
यह वस्त्र है—
धैर्य।
इसे धारण करोगी,
तो विपत्ति तुम्हें नग्न नहीं कर सकेगी।
यह हार है—
करुणा।
इसे पहनोगी,
तो शत्रु भी तुम्हारे भीतर माता को देखेगा।
यह कंकण है—
संकल्प।
इसे धारण करोगी,
तो हाथ कभी अधर्म का कार्य नहीं करेंगे।
यह नूपुर है—
मर्यादा।
जहाँ तुम्हारे चरण पड़ेंगे,
वहाँ धर्म का मार्ग बन जाएगा।
और यह तिलक है—
आत्मबोध।
इसे धारण करने वाला कभी स्वयं को शरीर नहीं समझता।”
सीता ने दोनों हाथ जोड़ लिये।
उनकी आँखों से अश्रु बहने लगे।
उन्होंने कहा—
“माते!
यदि ये गुण मेरे भीतर कभी स्थिर हो गए,
तो यही मेरे वास्तविक आभूषण होंगे।
सोने के आभूषण समय छीन सकता है।
किन्तु धैर्य,
क्षमा,
करुणा,
सत्य,
मर्यादा—
इन्हें कोई नहीं छीन सकता।”
अनसूया ने दोनों हाथ उठाए।
वे बोलीं—
**”पुत्रि!
आज मैं तुम्हें आशीर्वाद नहीं देती।
मैं तुम्हें पहचानती हूँ।
भविष्य तुम्हें केवल राम की पत्नी कहेगा।
परन्तु समय के पार बैठे ऋषि तुम्हें धर्म की अधिष्ठात्री कहेंगे।
जिस दिन संसार समझ जाएगा कि मर्यादा केवल पुरुष से नहीं चलती,
बल्कि स्त्री के धैर्य पर भी टिकी रहती है— उसी दिन तुम्हारा वास्तविक सम्मान होगा।
आज मैं तुम्हें यही वर देती हूँ— तुम्हारा जीवन ही आने वाले युगों का शास्त्र बने।”
सीता ने उनके चरणों में सिर रख दिया। उस क्षण ऐसा लगा मानो पृथ्वी स्वयं तपस्या के चरणों में प्रणाम कर रही हो।
वन के ऊपर पूर्णिमा का चन्द्रमा उदित हो चुका था। उसकी शीतल चाँदनी में दो स्त्रियाँ बैठी थीं। इनमे एक तप की पराकाष्ठा थी तो दूसरी मर्यादा की पराकाष्ठा और दोनों के मध्य से भारतीय दर्शन की वह धारा प्रवाहित हो रही थी, जो आने वाले युगों तक मानवता को दिशा देने वाली थी।