● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कैसी विडम्बना है कि पहली ओर, हमारे धर्माचार्य अपने वचनामृत के अन्तर्गत ‘धर्म’ की परिभाषा करते हैं, “धारयते इति धर्म:।” अर्थात् जो धारण किया जाता है, वह ‘धर्म’ है। मनुष्य जो कुछ भी धारण कर लेता है, उसे प्रकट नहीं है; वह तो स्वत: दिखता रहता है। दूसरी ओर, महन्तों साधु-सन्तों की सवारियों, अखाड़ों आदिक का प्रदर्शन किया जाता है? अंगरक्षकों-द्वारा की गयी व्यूह-रचना मे भयाक्रान्त रहनेवाले धर्मोपदेशक जब ‘आत्मा’ की अवधारणा को प्रस्तुत करते हैं तब उनके निरा अबोध बने रहने की प्रतीति उभरती है। ऐसे ही लोग ‘धर्म की दुकाने’ खोल-खोल कर बैठे हुए हैं। आश्चर्य होता है, जब सुशिक्षित धर्मान्धों का एक बृहद् समूह ऐसों का महिमा-मण्डन करते हुए परिलक्षित होता है। ऐसे भक्त उन आत्म मुग्ध पाखण्डियों को अपना वास्तविक भगवान् मान लेते हैं और समर्पण (कोमा) की मुद्रा में पड़े रहते हैं।
यहाँ एक अनुत्तरित प्रश्न है; वह कैसे, समझें।
धर्मध्वजा फहरानेवाले इस श्लोक का गायन करते हैं :–
“नाहं वसामि वैकुण्ठे,
योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति,
तिष्ठामि तत्र नारद।”
ऐसे मे, यक्ष प्रश्न हैं :— लोग ‘अपने-अपने भगवान्’ को ‘अपने भीतर’ क्यों नहीं ढूँढ़ते? भगवान् के स्पष्ट कथन का अनुकरण क्यों नहीं करते?
भगवान तो अपने परम भक्त नारद की शंका का समाधान करते हुए, सुस्पष्ट कर दे रहा है :– न मै वैकुण्ठ (कुण्ठारहित स्थान) मे रहता हूँ और न ही योगियों के हृदय मे। मेरे भक्त निष्ठापूर्वक जहाँ कहीं भी मेरा स्मरण करते हैं (कीर्तन-भजन करते हैं), मै वहीं उपस्थित हो जाता हूँ।
ऐसे मे, सहज प्रश्न है, अपने को भक्त कहनेवाले लोग अपने भगवान् के आदेश की अवहेलना क्यों करते आ रहे हैं? यही कारण है कि जिस किसी भी मत और समुदाय के लोग अपने भगवान्, खुदा इत्यादिक की कही हुई बात का निरादर करते हुए, जब कोई विपरीत कर्म करते हैं तब उनका ईश्वर उन्हें विविध प्रकार से दण्डित करता है, यहाँ तक कि प्राण भी हर लेता है।
राम-रहीम के नाम पर पाखण्ड करनेवाले लोग भीतर से कभी सुखी नहीं रहते; डरे हुए लोग होते हैं; अंगरक्षकों के साये मे चलते हैं। चरित्रवान् मनुष्य को किसी भी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं पड़ती; ‘बुलेट प्रूफ़ जैकेट’ की ज़रूरत नहीं पड़ती। ‘फुल बुलेट-प्रूफ़ जैकेट’ तो महाभारतकालीन ‘कर्ण’ के पास भी था; परन्तु उसका अन्त कैसा रहा? रामायणकालीन इन्द्रजित् मेघनाद जब पैदा हुआ था तब सामान्य शिशु की तरह से रुदन नहीं किया था, बल्कि मेघ की तरह से गर्जन किया था, इसीलिए उसका नाम ‘मेघनाद’ (‘मेघनाथ’ अशुद्ध है।) रखा गया था। उसने देव-देवियों के राजा इन्द्र को पराजित किया था, इसलिए ‘इन्द्रजित्’ (‘इन्द्रजीत’ अशुद्ध है।) कहलाया था। लंकेश रावण की नाभि मे अमृत था, जिस कारण उसका वध सम्भव नहीं था; परन्तु अन्त कैसा रहा? हमे इस सत्य को नहीं भूलना चाहिए।
भगवान् तो कहता है, “हम भक्तन के भक्त हमारे।”
दूसरी ओर, भक्त उच्छृंखल होते गये और रामभक्ति के नाम पर ‘रावणभक्ति’ करने लगे; मर्यादा-पुरुषोत्तम राम (विशुद्ध– ‘मर्य्यादा’) की प्रतिष्ठा नष्ट करने लगे।
ऐसे मे, भक्तों ने क्या कभी इन विन्दुओं पर विचार किये हैं :—
१- केदारनाथ, बदरीनाथ, अमरनाथ इत्यादिक तीर्थस्थानो मे मारे जा रहे अपने भक्तों को भगवान् क्यों नहीं बचा पा रहे हैं?
२- मक्का-मदीना मे ‘हज’ करने के लिए लाखों लोग जाते हैं और शैतान पर पत्थर के टुकड़ों को बरसाते समय बड़ी संख्या मे लोग प्रतिवर्ष मारे जाते हैं। उनके ‘अल्लाह’ उनके ‘ख़ैरख़्वाह’ क्यों नहीं बन पाते हैं?
निष्पत्ति– आपका मूल धर्म ‘कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा ही पूजा है; इबादत है तथा आराधना भी। आप समाज मे जिस ‘धर्म’ के नाम पर रक्तरंजित वातावरण देख-समझ रहे हैं, वह धर्म नहीं, ‘अधर्म’ है; पापाचार है तथा कर्मकाण्ड का बीभत्स (‘वीभत्स’ अशुद्ध है।) रूप भी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० जुलाई, २०२२ ईसवी।)