सरकारों, पूंजीपतियों और देश के लोगों के नाम एक पत्र

विवेकानंद सिंह (लेखक पत्रकारिता के पेशे से हैं)-


सरकारों, पूंजीपतियों और देश के लोगों!
नमस्कार!

हर बार की तरह हम सभी लोग बहुत खुश हैं, होना भी चाहिए, क्योंकि आज हमारी बहन-बेटियां दुनिया के सामने हमारी लाज बचा रही हैं। दीपा कर्माकर, साक्षी मलिक और पीवी सिंधू जैसी देश की सारी बहनों को मैं सलाम करता हूँ।

मेरी प्रिय सरकारों मैं देख रहा हूँ कि मेरी इन बहनों की त्याग, तपस्या और मेहनत से मिली सफलता का क्रेडिट आप ईनाम स्वरूप कुछ लाख, करोड़ रुपये में लेना चाह रहे हैं। यह गलत है। काश…आपने यही राशि खेल के विकास के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पहले से खर्च की होती, तो हमारी लिस्ट में यूँ पदकों का सूखा न होता। भारतीय जनता को आप पाकिस्तान से तुलना करके बता देते हैं कि देखो हम कितने आगे हैं। आप, पड़ोसी चीन को क्यों नहीं देखते? वहां, तो बतौर तानाशाहीवाली हुकूमत है, लेकिन अर्थव्यवस्था, विज्ञान, तकनीक, सैन्य, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल आदि सभी में हमसे वे मीलों आगे निकल चुके हैं। ऐसा नहीं है कि वे पहले से हमसे आगे थे! हमने और उसने लगभग एक ही साथ तरक्की की राह पर पग रखने की शुरुआत की थी। आज देखिए ओलिंपिक की पदक तालिका वे कहाँ हैं और हम कहाँ हैं?

जानते हैं वे हमसे आगे क्यों हैं? वे काजू के आटे नहीं, मकई और गेंहू के आटे की ही रोटियां खाते हैं। दरअसल, वहां राजनीति सिर्फ राजनीति में ही होती है। वहां विज्ञान में विज्ञान और खेल में खेल होता है। हमारे यहाँ, तो आपने हर क्षेत्र में राजनीति घुसेड़ रखी है। फिल्म इंस्टिट्यूट, मीडिया इंस्टिट्यूट, स्पोर्ट्स अकादमी हो या कोई अन्य संस्थान इन सभी जगहों पर आप अध्यक्ष या निदेशक के रूप में अपने राजनीतिक नुमाइंदे को नियुक्त करते हैं। खास बात है कि आपकी विचारधारा को पसंद करनेवाली जनता भी आपके फैसले पर खुश होकर ताली भी बजाती है। आपको लगता है कि आपके इस कदम से आपने विपक्षियों को मात दी और उनका नुकसान होगा! जी नहीं, उनको क्यों नुकसान होगा? वे भी, तो सरकार बनते ही आप जैसी हो जाती हैं। सही मायने में नुकसान तो उस विधा का होता है, जिसके विकास के लिए वह संस्थान बना है। नुकसान देश की जनता का होता है। हो सकता है कि आपको मेरी बातें अच्छी नहीं लगे, लेकिन आपसे विनम्र निवेदन है कि इन विजेताओं को धनराशि देने की अब जरूरत नहीं है, जो भारत जैसे देश से निकल कर ओलिंपिक में पदक जीत आई, वह कुछ भी कर सकती है। अगर देना ही है, तो उनके साथ-साथ, हर राज्य में जिले स्तर से खेल के विकास के लिए भी धनराशि दें। ओलिंपिक में सिंधू के पदक को जोड़ कर अब तक भारत के हिस्से 28 पदक आ चुके हैं। मेरा दावा है कि अगर आप हर क्षेत्र से सिर्फ राजनीति को निकाल कर राजनीति तक सीमित कर देंगे, तो भारतीय खिलाड़ियों, वैज्ञानिको, टेक्निशियनों, डॉक्टरों में इतना हौसला है कि वे देश का नाम बुलंदियों पर ले जा सकते हैं। यहाँ के खिलाड़ी एक ही ओलिंपिक में 28 पदक ला कर दिखा सकते हैं।

मेरे देश के पूंजीपतियों आप देश में, देश से मेहनत और दिमाग से पैसे कमाते हैं, आपकी मर्जी है कि आप किसी को कुछ भी दें या न दें। लेकिन, अच्छी बात है कि आप विजेताओं को उपहार व सम्मान देते हैं। पर, बुरी बात है कि आप उसमें भी अपना मुनाफा देख कर देते हैं। आप यहाँ भी बिजनेस माइंड के साथ अपनी पूंजी खर्च करते हैं। आप कहेंगे, इसमें क्या बुराई है? मैं एक बिजनेस मैन हूँ और बिजनेस ही मेरा धर्म है। पर, सोचिए क्या आपके पास एक-दो स्पोर्ट्स स्टार्स की जगह 100-200 वर्ल्ड क्लास स्पोर्ट्स स्टार हों, तो कितना अच्छा हो। उनके जरिये आप अपनी ब्रांड को और अधिक वैश्विक बना सकते हैं। जमशेद जी टाटा ऐसी सोच रखते थे। आपको भी विजेता से ज्यादा खिलाड़ी और खेल के विकास में दिलचस्पी रखनी चाहिए। इससे आपके पास निश्चित तौर पर विजेताओं की बड़ी तादात होगी।

मेरे देश के लोगों आप देख रहे हैं कि कैसे बेटियां कमाल कर रही हैं। सो, प्लीज ‘चैरिटी स्टार्टस फ्रॉम होम’! आप अपने घर से शुरू कीजिए, देखिए और सोचिए कि कहीं किसी प्रतिभा को जाने-अनजाने में आपने रोक या दबा तो नहीं दिया। अगर अब तक आप सो रहे हैं, तो जाग जायिये। फिर दुनिया में आपका ही परचम जरूर लहरेगा। आपने मेरी चिट्ठी पढ़ी, इसके लिए आपका धन्यवाद। कुछ गलत लगे, तो बेझिझक बता दीजिए।

आपका
विवेकानंद सिंह