अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार पाने वाले अभिजीत बनर्जी मोदी जी के आलोचक हैं तो क्या अछूत हो गये ?

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’

मोदी जी के आलोचक हैं तो क्या अछूत हो गये ? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र हैं तो क्या भारतीय मूल का ही नहीं मानोगे ? अरे भाई नोबेल पुरस्कार (अर्थशास्त्र) हेतु आदरणीय अभिजीत विनायक बनर्जी जी को शुभकामनायें देने में सङ्कोच कैसा ? श्री बनर्जी को विशिष्ट उपलब्धि हेतु अनेकानेक शुभकामनायें  ।
चाहें भारतीय-अंग्रेज़ हों या एंग्लो-इंडियन हमें तो सभी पर प्यार आता है । भारतीय अमेरिकी तो भारतीय जैसे नहीं भारतीय ही हैं । तो फिर अभिजीत बनर्जी के साथ भेद-भाव क्यों ? कहीं ऐसा तो नहीं पिछले आम चुनावों में श्री बनर्जी कॉन्ग्रेस के लिए जनोपयोगी योजनाएं तैयार करने वाले दल के अगुआ थे इसलिए वह आज भी कॉन्ग्रेसी ही दिख रहे है !पत्रकार रवीश कुमार को मैग्सेसे पुरस्कार मिलने पर भी कुछ ऐसी ही उदासी देखने को मिली थी । विश्वमय बन्धुत्व का उद्घोष करने वाला सनातन क्या हिन्दू बनकर वास्तव में सङ्कुचित हो गया है ? ऐसा तो कभी न था । रावण कभी स्वीकार्य नहीं रहा किन्तु उसका रचा "शिव स्तोत्र" सदा स्वीकार्य है । जब हमारी संस्कृति सदा से उदार रही है तो उदारवादी देश के अर्धभारतीय की पूर्ण उपलब्धि पर जयघोष के स्थान पर शहनाई क्यों ? आप तो स्वयं को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का अलमबरदार बताते हैं । उचित यही है कि दोहरा चरित्र छोड़कर अमर्त्य सेन के उत्तराधिकारी का स्वागत करें ।