डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
अध्यात्मवेत्ता, साहित्यकार
महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर थे। उन्होंने कहा था जीवों पर दया करो। जिओ और जीने दो का नारा महावीर स्वामी ने दिया था।उन्होंने दुनिया को सत्य अहिंसा का पाठ पढ़ाया। अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया। जैन धर्म का पंचशील सिद्धांत बताते हुए उन्होंने अहिंसा सत्य अपरिग्रह अचौर्य और ब्रह्मचर्य पर विशद उल्लेख किया। उन्होंने अनेकान्तवाद स्यादवाद और अलरिग्रह जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए।
महावीर स्वामी का जन्म जन्म कल्याणक के रूप में मनाया जाता है। भगवान महावीर न्यास क्व पुत्र थे।ये 599 ईसवी पूर्व एक शाही दंपति के यहां जन्मे थे ये अंतिम तीर्थंकर थे। इनका जीवन सुखमय था । इन्होंने कम उम्र से ही अपने आप को सभी सांसारिक चीजों से दूर कर लिया था।
तीस वर्ष की आयु में महवीर स्वामी ने अपने परिवार व राज्य मो छोड़ दिया था उन्होंने बारह वर्ष तक एक तपस्वी के रूप में जीवन व्यतीत किया। इस अवधि में उन्होंने सांसारिक चीजों को ही नहीं अपितु अपने वस्त्रों को भी त्याग दिया। उन्होंने इन वर्षों में ध्यान व आत्म संयम प्राप्त करने में समय व्यतीत किया।
इस प्रकार उन्होंने बयालीस वर्ष की अवस्था मे अतीत वर्तमान और भविष्य के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उनके ज्ञान का उद्देश्य जीवन की गुणवत्ता की उन्नति करना था।
उनके ज्ञान के तीन आध्यात्मिक कौए पाँच नैतिक सिद्धांत ही आधार हैं।उन्होंने बताया था जीवित शरीर मे आत्मा का वास होता है। आत्मा की सद्भावना में विश्वास करने वाले महावीर धर्म को बहुत सरल मानते थे।
सही विश्वास यानी समीज दर्शन सही ज्ञान यानि सम्यक ज्ञान सही आचरण यानि सम्यक चरित्र मोक्ष पाने के लिए पूरी तरह आवश्यक है। अच्छे व बुरे कर्म व्यक्ति की आत्मा से जुड़े होते हैं। महावीर स्वामी मानते थे कि भौतिक सम्पति कुछ समय के लिए ही खुशी देती है ये क्रोध घृणा और अन्य बुरे कर्मों को जन्म देती है इनको त्याग देना चाहिए। मोक्ष को प्राप्त करने के लिए महिला व पुरुषों में कोई अंतर नहीं होता।दोनो ही मोक्ष की तलाश करने के अधिकारी हैं।जीवन मे सकारात्मक दृष्टिकोण बहुत जरूरी है।
महावीर स्वामी ने कहा था कि एक निर्माता एक विध्वंसक और एक ब्रहाण्ड रक्षक के रूप में कोई भी ईश्वर नहीं है । महावीर स्वामी के बताए सिद्धांतों का पालन करने से शांति व परम् संतुष्टि मिलती है। इनकी शिक्षाएं आत्मा को शुद्ध करने और ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करती है। इन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आध्यत्मिक स्वतंत्रता का उपदेश देने में समर्पित की।
उन्होंने जैन धर्म स्वीकार करने वाले को पांच प्रतिज्ञाएं करने की बात कही। किसी भी जीवित प्राणी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे इसे अहिंसा कहा गया। ऐसा सत्य बोलें जिससे किसी को कष्ट न हों इसे सत्य कहा। तीसरी प्रतिज्ञा ऐसा कुछ भी न लें जिसे किसी के द्वारा दिया न गया हो यानि अस्तेय। चौथी प्रतिज्ञा किसी भो तरह की कामुक खुशी में लिप्त न हो यानि ब्रह्मचर्य का पालन करना। पांचवी प्रतिज्ञा उन लोगों को भौतिक चीजों और स्थानो से खुद को अलग करना यानी अपरिग्रह करना ।
आज विश्व मे बढ़ती हिंसा आतंकवाद के माहौल में महावीर की शिक्षाएं व सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है।
-डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
अध्यात्मवेत्ता ,साहित्यकार
भवानीमंडी राजस्थान