चिंतन : मूरख को मूरख कहै, अतिशय मूरख होय

आज ‘फर्स्ट अप्रैल’- मूरख दिवस है । आज के दिन चतुर लोग किसी को मूर्ख बनाने में आनन्दित होते हैं । मूर्ख बनाये नही जाते, होते ही हैं ।

मूर्खता साधारण बुद्धिमानो को विकार या सिन्ड्रोम सी लगती है । मूर्खता कोई प्रायोजित देशना नहीं, अन्तः करण की सदानन्दी आसन्दी है। मूरख की कार्य वृत्तिका मूर्धाभिषिक्त होनी चाहिये, पर असमझ लोग असहज हो मूर्खाभिषिक्त करते हैं। ‘मूरख’ कोमल और उदारमना होते हैं । मूरख ‘निश्छल ह्रदय’ होने के कारण दूसरों पर शीघ्र विश्वास कर लेते हैं,और परपंचशास्त्रियों की कलुष प्रवंचना में फँस जाते हैं ।’मूरख व्यक्ति’ प्रतिशोध अथवा प्रतिकार की भावना से दूर रहता है ।

मूरख अपने मनोदेश में युद्ध नहीं करता। मूरख अपकृत्य से दूर आनन्द की खोज में पागल पथिक की भाँति विचरण करता है। ‘मूरख’ दूसरों की ज्ञानगम्यता से उपकृत, उपह्रत नहीं होता है, वह तो अपना मार्ग स्वयं खोजता है । मूरख पगचिन्हों का अनुगामी नहीं, अपने विचित्र पगचिन्ह बनाता है । ‘मूरख’ अहंकार की निकृष्ट चिन्ता ग्रन्थि को अपनी मनोभूमि में कदापि अंकुरित नहीं होने देता है ।

शिक्षित मूरख लोकाचार विमर्जित होता है । मूरख किसी से याचना में नहीं देयता में, संग्रह में नहीं वितरण में,’ठहराव में नहीं गतिमान होने को तैयार रहता है । मूरख की धुन लक्ष्य प्राप्ति तक नहीं ठहरती ।

प्रेम में सर्वस्व समर्पण एक प्रकार की मूर्खता है जो परिणाम की कल्पना व प्रतीक्षा से अप्रभावित रहती है, अपनी मूर्खता तब समझ में आती है, जब वापस लौटना कठिन होता है ।
कोई भी व्यक्ति तब तक अर्हता धारी लगता है जब तक उसकी बातों व कार्यों का स्तर प्रकट नहीं होता। ‘मूरख’ स्वयं को कभी अयोग्य नहीं समझता है। ‘छली-मूर्ख’ कार्य को नहीं दिखावे में अपनी योग्यता मापते हैं, और ‘निश्छली मूर्ख’ श्रम की घनीभूत व्यथा की कथा कहते हुए भी मुस्कराते हैं । कुटिल-कंटिल व्यंग्य के आघात से कोई मूरख कालिदास बन गया तो कोई तुलसीदास ।

समझ में आया-
‘अपनी बानी नौ लखी, सुनि सुनि सद्गति होय ।
मूरख को मूरख कहै, अतिशय मूरख होय ।।

           अवधेश कुमार शुक्ला
          मूरख हिरदय, चैत्र-चतुर्थी कृष्ण
        फर्स्ट अप्रैल- मूर्ख दिवस
                01/04/2021