साधारण श्रमिकों के श्रम से उपार्जित पारिश्रमिक पर खुलेआम डाका

कल मजदूर दिवस था इसलिए सोचा कुछ लिखूँ
अतः यह आर्टिकल मेरे शारीरिक/मानसिक/भावनात्मक/चेतनात्मक श्रमिक भाइयों/बहनों/माताओं/बुजुर्गों को समर्पित है जो पिछले हज़ारों सालों से अपना पारिश्रमिक लुटवा रहे हैं धूर्त सरकारों व उनके डाकू उद्यमियों द्वारा ..

श्रम/परिश्रम का न्यायोचित मूल्य है परिश्रम करने वाले को उसका पारिश्रमिक 100% दिया जाये

सवाल –
क्या सचमुच मौजूदा सरकारी वित्तीय संस्थानों द्वारा बनाये गए नियम नीतियों व निर्णयों अर्थात कानूनों में न्यायोचित शब्द की अहमियत रखी गयी है?

यदि हाँ!
तो फिर RBI व वित्त मंत्रालय जैसे सरकारी प्रतिष्ठान/संस्थान ने मुद्रा पर रेपोरेट क्यों थोप रखा है?
और पूरी दुनिया जानती है कि किसी भी उद्यम हेतु श्रमिक का श्रम, पूंजीपति की पूँजी व सरकार द्वारा दी जाने वाली बिजली, पानी, सड़क, ट्रांसपोर्ट, संचार व अन्य सुविधा रूपी तीन संसाधनों की ही आवश्यकता होती है।

मतलब साफ़ है कि श्रमिक, पूंजीपति व सरकार ही प्रमुख पार्टनर होते हैं किसी भी छोटे या बड़े धंधे में ..

यदि आप सब उपरोक्त बात पर सहमत हैं तो फिर इस सवाल का जवाब दीजिये;

◆33% हिस्सा श्रम देने वाले श्रमिक को क्यों नही दिया जाता?
◆33% हिस्सा पूँजी देने वाले पूँजीपति को क्यों नही दिया जाता?
◆33% हिस्सा सुविधाएँ देने वाली सरकारों को क्यों नही दिया जाता?
(विचारणीय; न्यायोचित रूप से तीनों पार्टनरों को बराबर हिस्सेदारी दी जानी चाहिए लेकिन धूर्तों द्वारा बनाये गए अन्यायजनित कानूनों के चलते वर्षों से मजदूरों के साथ आर्थिक शोषण का खेल खुलेआम जारी है)

सभी जानते हैं मानवीय जीवन की दिनचर्या हेतु मुद्रा की उपयोगिता कितनी अहम है!

चूँकि मुद्रा हमें आपको हमारे परिश्रम द्वारा उपार्जित पारिश्रमिक के बदले प्रदान की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है।

इसलिए सरकारी डाकुओं (सरकार व सरकारी वित्तीय संस्थान) द्वारा खुलेआम लूटने का यह खेल आज़ादी के बाद से बनिस्बत जारी है, जिसे सरकारी भाषा में रेपोरेट के नाम से जाना जाता है।

यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि जिन सरकारों को हम-आप चुनकर सेवा करने हेतु संसद/विधायिका में भेजते हैं वे सब हमारे आपके पारिश्रमिक पर खुलेआम डांका डालने के विभिन्न प्रायोजनों का विस्तार करते रहते हैं।

यदि कोई बुद्धिजीवी हमारे आर्टिकल को पढ़ने के बाद हमारे इस प्रश्न का भी उत्तर दे सके तो बड़ा एहसान होगा उनका हमपर ..

प्रश्न;
आखिर क्यों सरकारी वित्तीय संस्थानों/प्रतिष्ठानों द्वारा मुद्रा पर रेपोरेट व बैंकों द्वारा ब्याज लिए जाने का कानून बनाया गया? जबकि सबको पता है कि मुद्रा से अतिरिक्त मुद्रा बिना श्रमिक के श्रम दिए नही कमाया जा सकता ..!

मतलब साफ़ है कि इन सरकारी डाकुओं को साधारण श्रमिकों के श्रम से उपार्जित पारिश्रमिक पर खुलेआम डाका डालकर अपने निजी ख़ज़ाने भरने की मंशा थी।

उम्मीद है उपरोक्त न्यायसंगत तर्कों से आप सब समझ ही गए होंगे कि अपने भारतीय समाज से अभी भी जमीदार-मजदूर व मालिक-नौकर की परंपरा खत्म नही हुई बल्कि फॉर्मेट बदला गया है।
और इस लूट के खेल को सरकारी संरक्षण भी प्राप्त हो चुका है कानूनी बाध्यता के दायरे में लाने की वजह से ..

श्रमिकों के श्रम से कमाए पारिश्रमिक पर खुलेआम लूट को रोकने का एकमात्र स्थाई समाधान;

■ RBI जैसे वित्तीय संस्थान/प्रतिष्ठान को तुरन्त रेपोरेट 0 करने की घोषणा करना चाहिए व 100% डिजिटल कर्रेंसी (रिकार्डेड मुद्रा फॉर्मेट) को लागू करना चाहिए।

■ वित्त मंत्रालय तत्काल प्रभाव से ट्रांगुलर इकॉनमी (त्रिकोणीय अर्थव्यवस्था) के न्यायोचित सिद्धांत पर आधारित श्रमिक, पूंजीपति व सरकार की 33% के अनुपात में हिस्सेदारी की घोषणा करना चाहिए।

उपरोक्त न्यायशील व्यवहारिकता के बिना आज मजदूर दिवस मनाना व दूसरों को शुभकामना भेजना/देना बेमानी है।

इस धूर्त सरकारी ढोंग से बचें ..!
।।धन्यवाद।।

राम गुप्ता – स्वतंत्र पत्रकार
अति साधारण कार्यकर्ता/प्रचारक
आमआदमीपार्टी, उत्तरप्रदेश