“हृदय के प्रणय-कुंज में लीन”– कविवर पन्त

आज (२० मई) कविवर पण्डित सुमित्रानन्दन पन्त की जन्मतिथि है।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय :

कल्पना के साथ सुमधुर कोमलता भी पन्त के काव्य में आरम्भ से ही संलक्षित होती है। वे प्रकृति का मातृरूप में दर्शन करते हैं और स्वयं एक बालिका के रूप में उपस्थित होते हैं। प्राकृतिक विपणन में एक अतीन्द्रिय कोमलता, एक रहस्यमयी सूक्ष्म शक्ति तथा एक ममतामयी माँ के साथ उनका प्रत्यक्षीकरण होता है। प्रकृति के प्रति विस्मय-भाव का सम्यक् चित्र पन्त के काव्य में ही उभरता है।

प्रात:-सायं तथा ऋतुचक्र में कवि को किसी अपरोक्ष सत्ता का निमन्त्रण कर्णकुहरित होता है। अनेक रूपों में, अनेक इंगितों में तथा अनेक प्रकार से उस परोक्ष का आकर्षण उसे पृथ्वी के क्षुद्र धरातल से शीर्ष की ओर ले चलने का आकांक्षी है।
कवि कहता है :—–
“न जाने कौन, अये द्युतिमान!
जान मुझको अबोध अज्ञान,
सुझाते हो तुम पथ अनजान,
फूँक देते छिद्रों में गान;
अहे सुख-दुख के सहचर मौन!
नहीं कह सकता तुम हो कौन!”

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० मई, २०२० ईसवी)