मज़दूर की व्यथा

शिवांकित तिवारी ‘शिवा’ (युवा कवि एवं लेखक)

पैदल चलकर नाप रहे ख़ुद सड़कों की लंबाई,

भूखें प्यासे  बच्चों  के  संग  मज़बूरी  में भाई, 

नंगे  सूजे  पैर  जल  रहे, बिना रुके दिन रात चल रहे,

भूख की खातिर छोड़ा था घर, गांव  छोड़  आये  थे  वो शहर,

भूख के कारण अब उनकी है पेट से स्वयं लड़ाई,

रक्तरंजित  सड़के  और पटरियां, चल रहें पैदल ही लेकर गठरियां,

पटरियों पर है पड़ी रह गई भूख, रोटियां भी गई पटरियों पर सूख,

पैदल चलते – चलते उनके पांव में फटी बिवाई,

खून  के  आंसू  रोते  चलते, बच्चों  को  कंधों  पर  टांगे,

सड़को  को  आंसू  से धोते, घर को निकले सभी अभागे,

घर पर बैठा आस लगाये बूढ़ा बाबा बूढ़ी माई,

क्या  करते  शहरों  में  रहकर, चूल्हा  कैसे   उनका   जलता,

नहीं  कोई  रोजगार बचा जब, फिर पेट सभी का कैसे पलता,

कोई भी सरकार नहीं कर पाई जख़्मों की भरपाई,

नहीं कोई  सरकार सहायक, सिस्टम  से  सबके  सब हारे,

बिखर गये सबके सपने अब, भूख से तड़प, मर रहे बेचारे,

मिलकर सबको करनी है सबकी रक्षा और भलाई,

संकट  के  इस  दौर में उनकी, मदद करें आओ हम मिलकर,

सबसे  पहले  है  मानवता  तो, अब शुरुआत करे सब मिलकर,

पैदल चलकर नाप रहे ख़ुद सड़कों की लंबाई, भूखे  प्यासे  बच्चों  के  संग  मज़बूरी  में भाई ।।

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