पुस्तक समीक्षा “साहित्य संगम संस्थान” कृति:- काव्यमेध

लेखिका:- इन्दु शर्मा”शचि”(कवयित्री)
समीक्षक:-राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित”
(राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी)
साहित्य संगम संस्थान, दिल्ली

काव्यमेध का विमोचन राजेश कुमार तिवारी ‘रामू’ ने शनिवार को किया। प्रस्तुत कृति का मुखावरण आकर्षक लगा,इसके प्रधान संपादक कैलाश मंडलोई कदम्ब,सम्पादक चन्द्रपाल सिंह चन्द्र, सह सम्पादक राजवीर सिंह मन्त्र एवम राजेश तिवारी रामू है। प्रस्तुत कृति को बनाने में आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार जी का योगदान अविस्मरणीय है। पुस्तक में ईशभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं से कृति का शुभारंभ किया गया। गणेश वंदना, माँ सरस्वती की वंदना में जीवन के सारे क्लेश दूर करने, राग द्वेष मन सर दूर करने की पुकार की गई है। शरणागत, खेवनहार रचनाएं भी भक्ति से परिपूर्ण लगी। प्रवाह कविता में आत्मा जो जीवन मृत्यु के प्रवाह में अनादिकाल से बहती आ रही है, थककर कहती है मैं ठहरना चाहती हूँ। वह कहती है हे नाथ मुझे जन्म मृत्यु के प्रवाह से मुक्त कर। जीव की मुक्ति तभी होती है जब वह आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, यही मुक्ति है यही आनंद है।

ओ बनवारी काव्य रचना में कवयित्री कहती है,रोम रोम है प्यासा मेरा बनवारी, मोहन कृपा कब बरसेगी में हारी। अगली रचना प्रेम के अनुरागी राजस्थान की कृष्ण भक्त मीरा बाई पर आधारित है, जिसमें मीरा को प्रेम दीवानी कहा गया है, मीरा ने लोक लाज छोड़ कर, राजघराना त्याग कर श्याम की अनुरागी बन गई। साथ ही नरसी जी, राधा, गज की जान बचाई जैसी कथाओं को भी कविता में बांधने का प्रयास किया है। हिंदी है पहचान कुण्डलिया छन्द में हिंदी भाषा का गुणगान किया है। कवयित्री कहती है भाषा ही अस्तित्व है, हिंदी है पहचान, रोम रोम में है बसी, यही हमारी जान।

योग पर आधारित कविता में योग कैसे करना चाहिए बताया गया है। शचि कहती है राग, द्वेष, मोह , लोभ आदि का त्याग करना योगी के लिए ज़रूरी है। योग गुरू बाबा रामदेव ध्यान और योग सुबह सुबह सिखाते है। सुन साँवरे काव्य रचना में कवयित्री लिखती है पाप का करो विनाश, देश को बचाइए,मौन तोड़ प्रेम की बांसुरी बजाइये। शचि कहती है धरती पर पाप का घड़ा भर गया गया है वह कृष्ण को बुलाने के लिए गुहार लगाती है।

अगली काव्य रचना समझदारी में बीरबल का उदाहरण देते हुए कहती है कि हमें अपने जीवन में जिंदगी के उलझे हुए सवालों को सुलझाना चाहिए। समझदार वही होता है जो अपने बल विवेक से काम करता है।रिश्तों की बगिया को वाणी के तीर मार कर नहीं कुचलना चाहिए। सोच समझ कर फैसला करना चाहिए उसे ही समझदार कहते है और जो झूठ बोलता है उसे भारी ठोकर का सामना करना पड़ता है।

नीलगगन कविता में पक्षियों की तरह कवयित्री भी पंख लगाकर उड़ने का मन बना रही है,वह कहती है मन करता है पंख लगा मैं,नील गगन में उड़ जाऊं,पंछी संग में आंख मिचौली खेलूं अरु मैं इतराउं। काव्य रचना माँ में कवयित्री कहती है माँ ईश्वर का रूप है, महिमा भी अनूप है। माँ का सम्मान करना चाहिए, वह हमें पालती पोसती है और बढ़ा करती है। अगली काव्य रचना विलुप्त होती भारतीय संस्कृति में विलुप्त होते संस्कार पर चिंता व्यक्त की गई है। अपने पुत्रों द्वारा बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक है। रिश्तों की मर्यादाएं टूटती नज़र आ रही है। आज अतिथि भी टीबी के रोगी जैसे लगने लगे है,महिला उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं पर भी कवयित्री ने पैनी कलम चलाई है। तत्पश्चात रचना भ्रूण हत्या में कन्या भ्रूण हत्या पर चिंता व्यक्त की गई है। बेटी होना कोई अपराध नहीं बताया गया है। कवयित्री लिखती है जीने दे मुझको भी माँ,मैं तेरे दिल का टुकड़ा हूँ,क्या हुआ अगर मैं बेटी हूँ,मैं तेरा सहारा बन जाऊंगी,भर दूंगी तुझे उजालों से,तेरा अंधकार पी जाऊंगी।

इस कृति की अंतिम रचना बाल विकास भारत के नौ निहालों पर आधारित है, कवयित्री कहती है बच्चे भारत के निर्माता है, इनके सपनों को साकार करने के लिए ऐसी शिक्षा देने की आवयश्कता है जिससे भारत का निर्माण हो सके। संस्कृति और संस्कार को बचाने की ज़रूरत है, इन्ही बच्चों में भगत सिंह, विवेकानंद है,इनका मन तिरंगे की तरह है जिनमें राष्ट्र भाव कूट कूट कर भरा है।

सारांशतः इंदु शर्मा जी का काव्यमेध अति सुंदर कलेवर से सजा भक्तिभाव से परिपूर्ण बहुरंगी चित्रों से मनोरम बन गया है। इस कृति में विभिन्न छंदों का समावेश किया गया है। प्रस्तुत कृति के विषय चयन की विशेषता देखते ही बनती है जिनमें कन्या भ्रूण हत्या, बाल विकास, विलुप्त होती भारतीय संस्कृति इस कृति के प्राण है।सभी रचनाएं भाषा एवं शिल्प की दृष्टि से परिपूर्ण है। साहित्य जगत में इंदु जी की ये कृति जन जन तक पहुँचे, इन्ही शुभकामनाओं के साथ बधाई।

98,पुरोहित कुटी,श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी जिला झालावाड राजस्थान